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Plate TXT · 5YR4PīyūṣalaharīDeva

URN · urn:vamshanidhi:scripture:01KTHGY4PSCV7ZC5EJYS3J5YR4

Scripture · text

Provisional

Pīyūṣalaharī

Pīyūṣalaharī

Liudmila Olalde

पीयूषलहरी अर्थात् गङ्गालहरी ॥ क० ॥ सकल मही को परिपूरण सौभाग्य यही वेद औ पुराणनको सरबससारहै । लीलाही करिकै जिन अखिलरच्यो है जग ऐसेत्रिपुरारिजूको बैभवउदारहै ॥ देवनकोसुकृत अमोघप्रकट्योहैसही सुधातैंसरिससुतौ शोभाको अगारहै । सलिलतुम्हासे गंग मंगलहमारो नित पादपअमंगलको काटन कुठारहै १…

Provenance ledger

2 entries

  1. AttributionLiudmila Olaldetextual
  2. SourceUpstream TEI document · bra · Devapublished primary

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		<author>Jagannātha Triśūli</author>
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            को बिदारतहैं ततकाल ॥ सेवत सकल सुरनिशिदिन जल<lb/>  
            जाको ऐसी तेरी मूरति सो चूरति अघबिशाल । सोई त्रय<lb/>  
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            हरैं ॥ तिनको दरसकरैं सरस पियूषहू ते स्वादित तु-<lb/>  
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            तुम्हारीउतपति है । दूजेईशशीशजटाजूटको भवनकिये<lb/>  
            करत निवास तू बिनोद सरसति है ॥ तीजे नष्टजीव<lb/>  
            पातकीनहूंके तारणकी बिधि है जे तिनमें तुम्हारी आ-<lb/>  
            सकति है । देखि न सकतदुःख दीननको एहोगंग कौन<lb/>  
            हेतु ते प्रभाव तेरोना जगतहै २१ शैलनके शिखर स-<lb/>  
            मूहन ते स्वच्छअति सरिता अनेक चली आवतहैं धा-<lb/>  
            इकै । तिनहींके मध्य ऐसी और कौनसीहै जो महेश<lb/>  
            जटाजूट चढ़ी अतिसुखपाइकै ॥ धोयेकहो कौने पद<lb/>  
            कमल रमापतिके अपने जलन सों मुदित मनभाइकै ।<lb/>  
            सुरधुनी याते तेरे लेशके समान सरि और दूजी नाहिं<lb/>  
            ताहि कहैं कबिगाइकै २२ होइकै निशंक विधि जैसेहोय<lb/>  
            तैसे सुतौ कस्योकरो ध्यानको समाधिहि लगायकै । सो-<lb/>  
            योकरो सुखसेज शेषकी रमानिवास निरंतर नाच्योकरो<lb/>  
            शम्भु मन लायकै ॥ सबै पापमोचनके सकृत समूहन<lb/>  
            ते हूजिये हमहिं परिपूरण सुभायकै । औरै तप दान के<lb/>  
            प्रयाससों न काम कछू जो पै जगजागौ तुम गंग सुख<lb/>  
            पायकै २३ मैंतो हूं अनाथ तुमनेह करियुक्त मात नष्ट<lb/>  
            गतिमेरी तुम शुद्ध गति दानीहौ । डूब्यो भवसागर में<lb/>  
            तुम विश्वतारणि हौ मैं रोग पीड़ित तुम सिद्धि वैद्य<lb/>  
            मानीहौ ॥ मेरो तो हृदयमात तृष्णाकरि ब्याकुलहै सु-<lb/>  
            धाको समुद्र आपवेदन बखानीहौ । याते शिशुशरणि<lb/>  
            तुम्हारी तकि आयो अब उचित बिधान सोई कीजै तुम<lb/>  
            स्यानीहौ २४ जादिनसों तेरी महि मंडल कल्यानी कथा<lb/>  
            प्रकटीहै तादिनसों कौतुकयोंछायोहै । यमके नगरमाहिं<lb/>  
            पातकी पुकारतहैं तिनको जो कोलाहल दुसह बिला-<lb/> 
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            योहै ॥ याते यमदूतदुरिदुरि जाय जहां तहां ढूंढिबे को<lb/>  
            प्रेतनको यतन उपायो है । औरै देवतानके बिमाननके<lb/>  
            यूथ मिलि दिवकी गलीन दलि धूमसों मचायोहै २५<lb/>  
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            प्रकटी प्रबल जटाझरहै । ऐसो जो प्रचंड ज्वरताको जो<lb/>  
            समूहतातेबसभयोपजरतमेरौबपुबरहै ॥ पौनकेसकाशते<lb/>  
            प्रकाशमान गंगतेरेजलकेतरंगनको कणिका निकरहै ।<lb/>  
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            नदी तापन के भर है २६ जाके मध्य चर थिर जीव<lb/>  
            सब बास करैं जोई तिहुँलोकनको एकओकहै उदार ।<lb/>  
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            तामें चलै बारबार ॥ औरै त्रिपुरारिके अपार जटाजूटन<lb/>  
            में जिटिरह्यो जोई शोभा सुखको सकल सार । सोईयह<lb/>  
            मात तेरे जलनको ब्रात अबहरौ सो हमारौ तन ताप<lb/>  
            को अखिल भार २७ जाके तारिबेकीविधि तामें तत-<lb/>  
            काल इहां तीरथ समूह सुनि लाजन मरत हैं । औरै<lb/>  
            त्रिपुरारि आदि देवता सकल जाके पातक विचारिकर<lb/>  
            कानन धरत हैं ॥ दयाकरि कोमल हृदय जाको ऐसी<lb/>  
            तुम पापी जुमैंऐसो ताहि पावनकरतहैं । याही ते तुम्हारे<lb/>  
            गुण तीरथ सुदेवनको पातक मथन गर्व खंडन करतहैं<lb/>  
            २८ पापनकी अमितचिकित्सानहूते मनतिनके चलाय<lb/>  
            मान ह्वै रहै निडर है । ऐसे श्वपचनके समूह तिनहूंन<lb/>  
            तजी तिनहींकी मलिन सभानको निकर है ॥ जिनही<lb/>  
            सभानको सदन ऐसो पातकी मैं ताहू के उधारन को<lb/>  
            बांधौ परिकर है । ऐसी तुम ए हो मात तिनकी बड़ाई<lb/> 
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            ताहि करिबेको समरथ ऐसो कौननर है २९ यह चिर-<lb/>  
            कालसों तुम्हारे अभिलाषहौ कि ऐसोमोहिं अबलगि<lb/>  
            पातकी मिल्योनही । जाके तारिबे ते यह सकल जगत<lb/>  
            मध्य बिस्मय अपार सबहिनकै भस्योसही ॥ सोई यह<lb/>  
            मैंतौ सुर तटिनी तुम्हारे तट अतिही सनेहकरि चाह-<lb/>  
            ना चितै यही । आयोसोई कीजिये सफल ताहि एहो<lb/>  
            गंग जोई अभिलाष माततुम्हारे मनैरही ३० निशि<lb/>  
            दिन मेरी नीचसेवनमें आसकति त्योंहीं वृथाबचनको<lb/>  
            करिबोहै बारबार । औरै ज्यों कुतर्कन में कीनोहै प्रचार<lb/>  
            मैंने झूठीपर चुगलीको मननकरनहार ॥ मेरे या प्रकार<lb/>  
            के अपार गुण तिन्हैं सुनि सुनिकरिएहो मात तुमहीं<lb/>  
            करो बिचार । छिनहूं जो मोसे पातकीको मुखदेखै ऐसो<lb/>  
            तुम बिना और कौन जगमें अतिउदार ३१ एहो मात<lb/>  
            गंग या जगतमाहिं जिनहीके हुये जो बिशाल नैन तोपै<lb/>  
            कहा काम हैं । जिनसों न कबहूं परम रमणीक अति<lb/>  
            मूरति तुम्हारी ना निहारी अभिरामहैं ॥ औरैजिन प्राणि<lb/>  
            नके श्रवण उदारमात बारबार तिनकोधिकार परिनाम<lb/>  
            हैं । जिनसोंन कबहूंतुम्हारी जेतरंगनको कलकलशब्द<lb/>  
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            बिमानबैठि जातसुरपुरको प्रमोद उरलाइकै । औरैपर-<lb/>  
            बशहोइ पातकी अपारतहां नरकनभीतर परतदुखपा-<lb/>  
            इकै ॥ अशुभमयमूरति जादेशकीतादेशहूमेंरहतबिभा-<lb/>  
            ग यहऐसोनितछाइकै । लीलाकरिकेई जिनपातकबि-<lb/>  
            नाशकीने ऐसीजहां तुमनाबिराजो मातआइकै ३३ मा-<lb/>  
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            मद्यपानहैं । ऐसेहूअपारपातकीजे मातअंतसमय त्या-<lb/>  
            गतशरीरनिज तेरेविषेआनिहैं ॥ बड़ेबड़ेदानी बहुयज्ञ-<lb/>  
            नकरनहारे जात जिनलोकनमें सुकृतबिधानहैं । तिन-<lb/>  
            हूतेऊपर बिमानबैठि क्रीड़ाकरैं करैंदेवजिनके चरण स-<lb/>  
            नमानहैं ३४ सुमनसमूहको अलभ्यमकरंद जाकूं जो<lb/>  
            वहपवन निशिबासर चुरीवैहै । बिरहकृपाणजाते पीड़ित<lb/>  
            बिरहीजन तिनहूंके प्राणनको छिनमेंदहावैहै ॥ लीला<lb/>  
            करिचलित लहरितेरी तिनहींको क्षोभताते ऐसोहू प-<lb/>  
            वित्रहोइधावैहै । दिनप्रतिसो वहसमीर तिहुँलोकनको<lb/>  
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            हिंमानव निरंतरयालोकको अरथरचै शुद्धमनजिनको ।<lb/>  
            कितनेहू ऐसेपरलोकनमें प्रीतिकरैं कष्टरीति साधिकै न<lb/>  
            करैं लोभतनको । मैंतौमातगंग कृपारावरीकोसंगपाय<lb/>  
            सैनकरो सुखसजि तजिकै यतनको । सबैभांति निहचैं<lb/>  
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            कीजे सुनियेसभामही । तिनहीसभानकी सहायकरिबेकू<lb/>  
            जैसे आपसमरथहौ सनेहकरिकेसही ॥ त्योंहींमातगंग<lb/>  
            दुरितनके समूहनमें मेरोहूसेनेह निशिबासररहैयही ।<lb/>  
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            शिव तिनकीजोलीलाताते उद्धतजटाअपाराजिनकोजो<lb/>  
            अंतजामें चंचलतरंगतेरी तेईजिमिकांपतहैं भुजानको<lb/>  
            बिसतार ॥ बिलमाहिं क्रीड़ाकरैं ऐसेजलताकोरव सोई<lb/>  
            मनोंचहूँओर डमरुनको डंकार । देवसरि तुम्हारो या<lb/> 
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            भार ३८ तेरेबिषे धारणकस्योहै मैंसकल विधि कुशल ह<lb/>  
            मारो जाकी चिंता ताकोभारहै । जोपैयाविषम समै एहो<lb/>  
            मात मंदाकिनि त्याग न करोगी मोसे पातकअगारहै ॥<lb/>  
            तौ जो शरणागत सहाय बिसवास तेरो ह्वे है त्रिभुवन<lb/>  
            मैंते अस्तइहबारहै । दीन प्रतिपालकजो करुणातुम्हा-<lb/>  
            री अब सोऊ यहनिहचैंही होगी निराधारहै ३९ उछ-<lb/>  
            रिजटाके जूटन तैं त्रिपुरारिजूके खेलतसीमंत कीजै शर<lb/>  
            णी मैं लैउमंग । देखततिनहिं ऐसे पारवती बाम अंक<lb/>  
            अतिही सनेह ताते बैठीहुतीपतिसंग ॥ मानिकै सपत्नी<lb/>  
            जो कोमलद्युति मान हाथ तासोंकरै दूरि तिन्हैंकोपभरी<lb/>  
            अंगअंग । सोई नित अधिक सबन ते उदयकिये बर-<lb/>  
            तो अनंद भरी तेरी ये तरंगगंग ४० पूजनीक तुम जो<lb/>  
            तिनको याजगतमाहिं कौनसे हैं जिन्ने नाहिंसरनि वि-<lb/>  
            धानिये । फलकी जेइच्छाकरैं इच्छाफल तिन्हैं देत सो<lb/>  
            यह उपाधिगंग मेरे उरमानिये ॥ मैं तो मात शपथ तु-<lb/>  
            म्हारी खाइ ककौं अबै यामें आपनेक कछू झूठनाहिं<lb/>  
            जानिये । मेरो मनतुम विषे सहज सुभावहीते करत<lb/>  
            सनेह यह निहचैं प्रमानिये ४१ एकबेर सहज सुभाव-<lb/>  
            हीते जगमाहिंजीवजे हैं तिन्ने ताको तिलक लगायो<lb/>  
            भाल । जिनको अज्ञानसोई तमके समान ताहिदूरिकरि<lb/>  
            बे को सोतरनकी किरणिभाल ॥ औरैजो बिरंचि खोंटे<lb/>  
            अंकनकी पांति लिखी ताही छिनतिनको मिटावत है<lb/>  
            ततकाल । सोई वह मृत्युका मनोहर तुम्हारीगंग दूरि<lb/>  
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            देशजिनमें आसक्त मन जिनहीके ऐसे जे मनुष्यमति<lb/>  
            मन्दहैं । तिनकी फूलनके समूह फूलिबेके मिस करिकै<lb/>  
            करतसदा हाँसीजे बलंदहैं ॥ औरै अपने जो मकरंदते<lb/>  
            पबित्रकरैं आवै जो अलीनके महामलीन बृन्दहैं । तेई<lb/>  
            वे हमारे नितसखा होउ मंदाकिनि तेरे तिरके जे तरु<lb/>  
            आनँद के कन्दहैं ४३ एकजे पुरुषहैं ते जिनकी कठिन<lb/>  
            सेव ऐसे देव तिन्हैं करैं यजन बिधान हैं । तिनते अपर<lb/>  
            यम नियम प्रमाण करैं कितनेहू बिधिवत करत वितान<lb/>  
            हैं ॥ मैं तो गंगनाम नित सुमिरण तेरो करों जाते भये<lb/>  
            पूरेसब कामके निदान हैं । याते मैं जननी जो बिशाल<lb/>  
            यह जक्त जालजानतहौं जाकोतृणजालके समानहैं ४४<lb/>  
            जन्महीते आदिलै निरंतर सकलविधि करत सुकृत ऐसे<lb/>  
            संतजे सुजानहैं । तिनके तोहित करिबेको मात मन्दा-<lb/>  
            किनिकौनसे न जगमाहिं देवता प्रधानहैं ॥ अस्तभये<lb/>  
            सब अवलम्ब जिनहीके अरुकीने तिनकबहूंना सुकृत<lb/>  
            बिधान हैं । ऐसे पुरुषनको या लोक परलोक माहिं तुम<lb/>  
            बिना और कौनहितको निदानहैं ४५ शीघ्रही तुम्हारो<lb/>  
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            संगमैं । जाग्योदिनरैनि बहुख्यालनमें पाग्योरह्यो पायो<lb/>  
            बिसराम कोनलेशकहूं गंगमैं ॥ दयायुत हृदय तुम्हारो<lb/>  
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            नके तारणकी बुद्धिते अवग्यामेरीकरो ना निहारिकै ।<lb/>  
            होहु सावधान अंगसाहस बिधानकरि मेरे तारिबे को<lb/>  
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            छबि शशिखण्डमंडित मुकुट द्युतिमानहैं । जाकी चारु<lb/>  
            चारिहू भुजान मैं बिराजमान कुम्भ औरपंकज अभय<lb/>  
            बरदान हैं ॥ अमृतकी धारासम धारैं बस्त्र आभूषण<lb/>  
            बढ़ी श्वेत मकर पै शोभाको निधान हैं । ऐसो जो तु-<lb/>  
            म्हारोबपु ध्यानकरैं एहो गंग तिनको जगतमैं न होत<lb/>  
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            सों भूँजेअंग ऐसेनर तिनको दयासमेत । मंदमुसका-<lb/>  
            निते प्रकाशितबदनज्योतिजाकेजेतरंग सुधातिनतेजि-<lb/>  
            वाइलेत ॥ औरैचैतन्यरूप स्वच्छचांदनी समूहजाको<lb/>  
            जो चमतकार ताकोबिसतारदेत । ऐसीतुमसंतनकीअं-<lb/>  
            गनाजुएहोमात अबतौबिधानकरो मेरोकल्यानहेत ४९<lb/>  
            यहसंसाररूप ब्यालबिकरालजानै डस्योअंगजाको सो<lb/>  
            मैं पीड़ितहौं आठोयाम । मीलितसे मंत्रभये डरेदेव देखि<lb/>  
            ताहि ओषधिप्रभावजापैनेकनकरतकाम ॥ गरुड़संबंधी<lb/>  
            जे पाहन फूटि छारभये खिसले हैं सघन सुधाके रसहू<lb/>  
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            तब । चंचल उतंग याते फैलीजे तरंगघटा तिनकोतां<lb/>  
            डवसो पवित्रकरौ हमैं अब ५१ ॥ छंदगीतिका ॥ की<lb/>  
            बिभूषित मदन रिपुको जिनहिं उत्तम अंग है । जै<lb/>  
            अनेक न दीनजनकी करत आरत भंग है ॥ मनहर<lb/>  
            उतंग तरंग जाकी चलत आनँदकी भरी । सोई हमा-<lb/>  
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            नाम पियूष लहरी सकल मंगलकी भरी । यह जग-<lb/>  
            न्नाथ उदार पण्डितराज ने निर्मित करी ॥ इकद्योस<lb/>  
            मिश्र उदाम सबगुण ग्रामरूप सुरामनै । इमि भांति उर<lb/>  
            अभिलाष करि आयसु दई सुखधामनै ५३ यह देव<lb/>  
            बाणी संस्कृत अति कठिन समुझि न आवही । मति-<lb/>  
            मंदनर कलिकालके किहिभांति अर्थहि पावही ॥ यातें<lb/>  
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            कलनर भाषतामैं रचौं छंद बनाइकै ५४ यह धारिआ<lb/>  
            यसु शीशगुरुकी बुद्धि निजअनुसारही । बलदेव वैश्य<lb/>  
            खँडेलवार बिचार जिन भाषा कही ॥ जे पढ़हिं याहि<lb/>  
            पढ़ावहीं अरु सुनहिं श्रवण करावहीं । तेईअनुग्रहगंग<lb/>  
            की जयसंपदा नरपावहीं ५५ ॥ सोरठा ॥ शशि नभ<lb/>  
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            खानि यह पियूष लहरी रची ५६ ॥</ab><lb/>  
            <trailer>इतिश्रीपीयूषलहरीसम्पूर्णा ॥</trailer><lb/>  
            <trailer>मुन्शीनवलकिशोर (सी आई ई) के यंत्रालयमें छापीगई<lb/>  
            नवम्बर सन् १८९० ई॰ ॥</trailer> 
       
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