Plate TXT · WPAJŚakuntalā upākhyānaDeva
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Scripture · text
ProvisionalŚakuntalā upākhyāna
Śakuntalā upākhyāna
Liudmila Olalde
कथाप्रारंभ ॥ काब्य बद्ध शकुन्तला दुष्यन्त के गन्धर्व विवाह के विषय में सवैया एक समय मुनिनायक कौशिक कानन जाय महातप कीन्हों । देह को दीन्होंकलेश महा मिटि भेष गयोन परै कछु चीन्हों ॥ निशिबासर नेमकियो ही निवाज, निरंजन के पद मैं चित दीन्हों । साधिकै योग को आ- सन यों इन्द्रासन इन्द्र…
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2 entries
- AttributionLiudmila Olaldetextual
- SourceUpstream TEI document · san · Devapublished primary
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<title>Śakuntalā upākhyāna</title>
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<publisher>Project "CrossAsia - Fachinformationsdienst Asien", 2016-2018.</publisher>
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<p>More information and fuller details of this license are given on the Creative Commons website.</p>
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<date>2018</date>
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<p><bibl>Nivāja Kavi, Śakuntalā upākhyāna. 1st ed.. Lakhanaū: Navalakiśora, 1895. doi: <ref target="http://digi.ub.uni-heidelberg.de/diglit/nivajakavi1895">http://digi.ub.uni-heidelberg.de/diglit/nivajakavi1895</ref>.</bibl></p>
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निरंजन के पद मैं चित दीन्हों । साधिकै योग को आ-<lb/>
सन यों इन्द्रासन इन्द्र को चाहत लीन्हों ८ अन्हैबे<lb/>
कों तीरथ कोऊ बचो न फिर्यो सिगरीं सरतानि के<lb/>
कूलनि । चारिहू आगि के बीच में बैठि सह्यो सविता<lb/>
सन्ताप के शूलनि ॥ धूम को पान अमान कियो पग<lb/>
ऊरध बांधि अधोमुख झूलनि । चौंसठि साल विशाल<lb/>
ऋषीश्वर खाइ रह्यो बन के फल फूलनि ९ ॥<lb/>
घनाक्षरी छंद<lb/>
धूपके दिननि हेरैमन मुख सूरज सों सन्मुख चाहे<lb/>
अरु प्रबल अनल वारि धरि कें । जाड़े के दिननि<lb/>
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यों रहत जल सोइबैठि रहत नदीमें गरे लों जल भरि<lb/>
कें ॥ देखि विश्वामित्रको बिशालनेम संयमयों अतिही<lb/>
सुरेश सो सरल भयो डरिकें । मन को प्रपंच करिबेकों<lb/>
मघवाने तब मेनका बुलाई सन्मान बड़ों करिकें १० ॥<lb/>
दोहा । आदर देखि सुरेशको हरषति हिरदयखोलि ।<lb/>
याविधितबमघवानसों उठीमेनकाबोलि ११ ॥<lb/>
घनाक्षरी छन्द । और की कहाहै ब्रह्म हरिहरहू कों<lb/>
जो कहो तो मन्मथ बश काम करि आऊं सो । मेरेमहा<lb/>
मोह में ठहरि सको छिन भरि ऐसो तिहूंलोक में मैं<lb/>
योगी ठहराऊं सो ॥ विश्वामित्र जू को जप तप नेम<lb/>
संयम घरी में खोइ आऊं नेक अवसु करिपाऊं सो ।<lb/>
मुनि के जो मेनकेत नाच गान चाउ महाराजकी दुहाई<lb/>
मैं न मैनका कहाऊं सो १२ ॥<lb/>
छप्पै । गहिकर बीन प्रवीन निपटपरवीन पियारी ।<lb/>
चढ़ि बिमान असमान लोकतें भूमि सिधारी ॥ सोरह<lb/>
करि शृंगार पहरि द्वादश आभूषण । लखि जु अंग<lb/>
की ज्योति गये छिपि शशि अरुपूषण ॥ तप भंग कर-<lb/>
न की बेलि सी फुरसति सी फूलीफली । मूरति बनाइ<lb/>
निज मोहनी मुनिके मनहिं मोहन चली १३ ॥<lb/>
हरिगीत छन्द । सुखिचंद की नहिं होति अब ल-<lb/>
खि ज्योति जा मुखचंदकी । लरिव चरनकर सुखमा भजी<lb/>
सुखमा सरोरुहचंदकी ॥ लखि नैन जाके ललित खंजन<lb/>
मीन अरु मृगनैन की । मुनिमैन के बश करन को उ-<lb/>
तरी तपोबन मेन की १४ ॥<lb/>
हरिगीत छंद । फहरात अंचल नैन चंचल निपट<lb/>
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लचकत लंफतें । करत विविधकटाक्ष अलपत रागऊंचे<lb/>
सुरनतें ॥ सुनिरागके मृदु सुरनिमुनि दृगखोलिदीन्हें ध्या<lb/>
न तें । छबि लखत लूट्यों तपजुछूट्यो छुट्यो ऋषि तप<lb/>
ज्ञानतें १५ ॥<lb/>
चौपाई । मार्यो मन्मथ साधि शरासन । छोड़ि दि-<lb/>
यो मुनि योग को आसन ॥ जप तप संयम धर्म नशा-<lb/>
यो । मोहि मेनका के ढिग आयो ॥ अंग अंग सों आ-<lb/>
नि लगायो । योग कियेको फल मनु पायो ॥ एक मुहू-<lb/>
रत के सुख कारन । खोयो तप करिबर्ष हजारन ॥ पी-<lb/>
छे निकट बहुत पछितानो । वा बन तें मुनि अनत परा-<lb/>
नो ॥ गर्भ मेनका कीन्हों धारन । तब सो मन में लगी<lb/>
बिचारन ॥ नर गर्भहि ले कें जो जावै । तो सुरपुर<lb/>
महँ पैठि न पावे ॥ भई सुता नौ मास भये जब । गई<lb/>
मेनका सुरपुर को तब ॥ १६ ॥<lb/>
सवैया । डर डारि सुता कों गई सुरलोकहि दूध<lb/>
पियायो न एक घरी । यह जानि कें मानस की जन्मी<lb/>
कछु मेनका नेकु दयानधरी ॥ कुल माहिंन कोऊ जोराखे<lb/>
कहूं वह काहे को धौं करतार करी । सुधिलेबे की कोऊ<lb/>
नहीं सँगमें बन सूने शकुन्तला रोवे परी ॥ १७ ॥<lb/>
सवैया । न्हैबेकों जाय कढ़यो तिहि मारग देखि के<lb/>
कण्व कृपा अति कीन्ही । देव कि दानवकै नर की कि-<lb/>
धौं नाग की है न परै कुछचीन्ही ॥ सुंदर ऐसी सुताकि-<lb/>
हि कारण को बन में गहि डारि धों दीन्ही । रोवे अके-<lb/>
ली परी बनमें ऋषिआय उठाय शकुन्तला लीन्ही १८ ॥<lb/>
दोहा । लीहें सुता शकुन्तला कलपत आश्रम आय ।<lb/>
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कह्यो गौतमी बहनि सों याकों देहु जिवाय ॥ १९ ॥<lb/>
छप्पै । सुन्दर गात निहारि गौतमी गरैं लगाई ।<lb/>
आयुर्बल तें जिअत नहीं करि यतन जिवाई ॥ करैं कृपा<lb/>
ऋषि बहुत सबै सबके मन भाई । सकल तपोबन मा-<lb/>
हिं कण्वकी सुता कहाई ॥ दिन दिन कन्या बढ़त प्रभा<lb/>
छबि अंग अंग फैलिनलगी । गहिबांह सखिनि के संग<lb/>
द्रुमनछांह खेलन लगी ॥ २० ॥<lb/>
दोहा । शकुन्तला सँग दुइ सखी रहतीं आठौ याम ।<lb/>
यक अनसूया नाम अरु प्रियम्बदा यकनाम ॥ २१ ॥<lb/>
सवैया । बैस हैं तीनों समान सखीं दिन हूं दिन<lb/>
तीनहुं प्रीतिबढ़ाई । प्राण तिहूंनके ह्वैरहे यों यक देह में<lb/>
तीनहुं देह दिखाई ॥ शोभा तिहूंन के अंगनि की कबि<lb/>
केतो करे बरणी नहिं जाई । राखी तिहूंन के अंगनि में<lb/>
बिधि तीनहुं लोक की सुन्दरताई ॥ २२ ॥<lb/>
सवैया । काम कमान चढ़ाइ मनो जबहीं कसि के<lb/>
कहुं मोंहनि फेरे । बात कहे हँसि कें जबहीं तब श्रौन-<lb/>
नि माहिं सुधासो निचोरे ॥ जामग ह्वैके धरे पगतामग<lb/>
आनि अनंग अगारू ह्वै दौरे । सुन्दर हैं वे तीनोंसखीं<lb/>
पै शकुन्तला की छविहै कछु औरे २३ ॥<lb/>
दोहा । कछुकदिनन में कण्व मुनि बनते कियोपयान ।<lb/>
आश्रमराखिशकुन्तलातीरथचल्योनहान २४ ॥<lb/>
सवैया, । कछु खैबे कों माँगो चहो जब हीं तब हीं<lb/>
तुम गौतमी सों कहियो। ऋषि आवे जो कोऊइतै तिहि<lb/>
को करि आदर पांइन को गहियो ॥ यह सीख शकुन्त<lb/>
लै दै जू गयो ह्वै उदास कछू करियो न हियो । रह<lb/>
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द्योसनि में फिरि आवतु हों तब लों तुम आनन्द सों<lb/>
रहियो २५ ॥<lb/>
लागी रहन बाप बिन बनमें । मई उदासी कछुक<lb/>
दिनन में ॥ आश्रम कोउ अतीत जो आवे । ताकों आ-<lb/>
दर निपट दिवावे ॥ पासहि के तंदुल गहि ध्यावे । मृग<lb/>
छौननि कों आनि खवावे ॥ पानी भरि मूलनि ढरकावे ।<lb/>
छोटे छोटे द्रुमनि बढ़ावे ॥ सोई करै जो यह कछुभाखै ।<lb/>
जियतें अधिक गौतमी राखे ॥ शकुन्तला को सुख बहु<lb/>
चाहति । दोऊ सखियन सँग में राखति ॥ बालबैस बहु<lb/>
द्योस बिताई । झलकनि लगी कछुक तरुणाई २६ ॥<lb/>
घनाक्षरी । बिसरन लागो बालापनको अयनप सखिन<lb/>
सों सयानप की बतियां गढ़न लगी । दृगलगि तिरीछे<lb/>
चलनि पग मन्द लागे उर में कछुक उसांसे सी चढ़न<lb/>
लगी ॥ अंगनि में आई तरुणाई की झलक लरिकाई<lb/>
अब देह तें हरें हरें कढ़नलगी । होन लागी कटिया<lb/>
वचटिकें छला सी द्वैज चन्द्र की कला सी तन दीपति<lb/>
बढ़न लगी २७ ॥<lb/>
चौपाई । बनहू मैं नहिं दुरति दुराई । शकुन्तलाकी<lb/>
सुन्दरताई ॥ जनु बिरंचि कर आपु बनाई । देखे तें मन<lb/>
सुधा सिराई । वह उपमा बरणी नहिं जाई । पूर्व कथा<lb/>
भारत में गाई २८ ॥<lb/>
घनाक्षरी । मृग के चर्म ही को पहिरैंदुकूल और<lb/>
गहने की कहा है न गरे में जाकें पोति है । तोऊ जाके<lb/>
अंग अंग रूपके तरंग उठें सुन्दर अनंग मानों अगनि<lb/>
की सोति है ॥ देह में निवाज ज्यों ज्यों जोबन बढ़त<lb/>
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जात त्यों त्यों हरि दिननि बढ़त जात जोति है । छिन<lb/>
और देखिये घरी में कछु और और और छिन छिन<lb/>
घरी घरी औरै द्युति होति है २९ ॥<lb/>
दोहा । सुन्दर वैसो बर मिले शकुन्तला ज्यों आप ।<lb/>
करि है ताको ब्याह यह करीप्रतिज्ञा बाप ३० ॥<lb/>
लागी रहे शकुंतला बन में यह परकार ।<lb/>
एकसमयदुष्यन्तनृप खेलनकढ़योशिकार ३१ ॥<lb/>
घनाक्षरी । रथ असवार दौरे देखिकें शिकार नृप<lb/>
कीन्हों श्रम इतनो न जाकी कछु माप है । दिन चढ़ि<lb/>
आयो बढ़ि कढ़ि अति दूरे पैन पायो तोऊ यातें चढ़ि<lb/>
आयो तन तापहै ॥ जाय नजकाने घोड़े पवन के समा-<lb/>
ने दौड़े बाण सों मिलाय खैंचि कान लगि चाप है ।<lb/>
आगे तें हरिण भाग्यो ताके नृप संग लागो रही पीछे<lb/>
सवसैना पीछै हिरिना के आप है ३२ ॥<lb/>
सवैया । फोंक लगाय करेरी कमान में कान लों खैं-<lb/>
चि लियो शर सास्यो । चोट करैं जब लों तब लों ऋषि<lb/>
लोगन दूरि तें आनि पुकास्यो ॥ रक्षा ऋषीश्वर लोगन<lb/>
की करिबे कों भयो अवतार तिहारो । हाहा रह्यो मह-<lb/>
राज हमारे तजो बन को मृग है मत मारो ३३ ॥<lb/>
चौपाई । ऋषि लोगन यह टेर सुनायो । मृग पर<lb/>
नहिं नृप बाणचलायो ॥ बागें गहि रथ ठाढ़ों कीन्हो ।<lb/>
आशिर्बाद ऋषिन तब दीन्हो ॥ करि प्रणाम नृप पूछौ<lb/>
यह तब । कहो कण्व को आश्रम कहँ अब ॥ आज पाप<lb/>
पुंजनि परि हरें । मुनिवर को चलि दरशन करें ॥ यह<lb/>
सुनि ऋषिन बहुत सुख पायो । आश्रम निपट नगीच<lb/>
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बतायो । महाराज अब कछु दिन भये । तीरथ करन<lb/>
कण्व मुनि गये ३४ ॥<lb/>
चौपाई । शकुन्तला बेटी करि पाली । सौंप्यो ता<lb/>
कहँ आश्रम खाली ॥ जो महराज वहां लगि जैहैं ।<lb/>
यह सुनि कण्व महा सुखपैहैं ॥ तीरथ न्हाय जबै मुनि<lb/>
अयहैं । शकुन्तला तासों पुनि कहि हैं ॥ यह मुनि<lb/>
बचननृपति मनबैठ्यो । रथतेंउतरि तपोबनपैठ्यो ३५ ॥<lb/>
रथ सारथी समेत टिकायो । आश्रम निकट आप<lb/>
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यो । सगुन भयो ता कर फल पायो ॥ अद्भुत रूप बैस<lb/>
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त हवै हवै आवतीं । कोमल कमल से करनि सों क्यारीं<lb/>
नवीन बनावतीं ॥ सिगरो तपोबन सींचिबेकों सलिल<lb/>
श्रमकरिल्यावतीं । छोटे द्रुमनकेतटनि भरि भरि घटनि<lb/>
को ढुरकावतीं ३७ ॥<lb/>
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डगमगतिधरतीं पांयहैं ॥ खुलिकेशपासरहे बिथुरिभरती<lb/>
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तहैं ॥ बिचद्रुमनके हवै जाति बाहर निकसि जोबन की<lb/>
छटा । खुलि गये कच यों तड़ित हूं पर गिरि परी मनु<lb/>
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शशिकला । यह रूपसों श्रम मुनिन के सो करत बल<lb/>
शाकुन्तला ३८ ॥<lb/>
घनाक्षरी छन्द । बानी कहिये तो वह बीन को लिये<lb/>
ही रहे मौरी तौ गिरीश अर्द्धंग में लगाई है । कमला<lb/>
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घनाक्षरी । निरखि शकुंतला को नखशिख रीझि<lb/>
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उरप्रेम गहि चित्र लिखि काढ़यो मनो ठाढ़यो नृप हवै<lb/>
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दोहा । शकुन्तला को रूप लखि सुफल भयोनृपनैन ।<lb/>
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सघन द्रुमनकी ओटह्वै दृग निमेष बिसराय ।<lb/>
दुरें दुरें देखन लग्यो शकुन्तला के भाय ४२ ॥<lb/>
चौपाई । राजहि ये देखहि नहिं कोऊ । पूछन लगीं<lb/>
सहेली दोऊ ॥ शकुन्तलाजो सींचत जेते । मुनिके द्रुम-<lb/>
प्यारे कहि तेते ॥ मुनिकें तो प्राणनतें प्यारी । करी द्रुम-<lb/>
निकी सींचनिहारी ॥ बिधिअतिहो सुकुमारि सम्हारी ।<lb/>
श्रमलायक नाहिं देह तिहारी ॥ बतकहाव यों सखियन<lb/>
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कीन्हो । शकुन्तला यह उत्तर दीन्हो ॥ ये द्रुम जे सब<lb/>
देत दिखाई । मैं जानति येही मम भाई ॥ मुनि के कहे<lb/>
नहीं मैं सींचति । मोहिं मया लागति इन की अति ॥<lb/>
हरिन चर्म की पहिरें आंगी । कसि बँधि गई गड़न<lb/>
उर लागी ॥ कर सों अँगिया खुलत न खोली । अन-<lb/>
सूया सों तब यों बोली ॥ प्रियम्बदा कसि बांधी छति-<lb/>
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अंगिया खोली । प्रियंबदा तब रिस करि बोली ॥ उस<lb/>
सति आवे छिन छिन छतिया । याते गाढ़ी द्वैगइ अं-<lb/>
गिया ॥ बढ़त जात जोबन की लीला । नाहक मेरो<lb/>
करतीं गीला ॥ शकुन्तला सुनि के शरमानी । सींचन<lb/>
लगी द्रुमन भरि पानी ४४ अलि यक छोड़ि कुसुम्भ<lb/>
उड़ानो । शकुन्तला मुख पर ठहरानो ॥ सुमुखि सुगंध<lb/>
पाय करि मधुकर । बैठयो जाय मधुर अधरन पर ॥<lb/>
ससकि हाथ तबहीं झहरायो । उड़ि अलि गयो फेरि<lb/>
फिरि आयो ॥ शकुन्तला ह्वांते टरिआई । पीछे भ्र-<lb/>
मर लग्यो दुखदाई ॥ शकुन्तला पुनि जित जित<lb/>
डोले । तित ति भ्रमर गुंजरत बोले ॥ राजा नि-<lb/>
रखत मन अनुरह्यो । मन मन मधुकर सो अस<lb/>
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घनाक्षरी छन्द । ओठन समीप गुंजत मड़रातमनो<lb/>
बतकही की लगावत लगन हो । चंचल दृगनि की<lb/>
पलनि करी क्षोभित हूंछुओ फिर आनि कर कपोल<lb/>
फल कनीहो ॥ प्यारी ससकनि झहरावति करति तुम<lb/>
उड़ि उड़ि बैठत पियत अधरन हो । दुरि दुरि दुरिही<lb/>
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ते देखत खड़े रहत मानो हम कीने काज मधुप तुम<lb/>
धन्य हो ४९ ॥<lb/>
चौपाई । शकुंतला केतो कछु करै । सँग ते मधुप<lb/>
न टास्यो टरै ॥ बन में मधुकर बहुत सताई । शकुंतला<lb/>
यह टेर सुनाई ॥ सखियहु मोंढिग अरबर आवहु । या<lb/>
पापीते मोहिं छुड़ावहु ॥ काटत आप टरत नहिं टारे ।<lb/>
होतु नाहिं कछु हाथन झारे ॥ निरखि सखिन यहहास<lb/>
बढ़ायो । हमको तो बिन काज बुलायो ॥ या गनीम सों<lb/>
आनि बचावे । नृप दुःष्यन्तहि बेगि बुलावे ॥ तब नृप<lb/>
निकसि द्रुमनते आयो । कहो कहो किहतुमहिं सतायो ॥<lb/>
निरखि नृपहि बिन मोल बिकानी । तीनों छकीं डरीं<lb/>
अकुलानी ॥ ठाढ़ी रहि न सकीं नहिं डोलें । जकि सों<lb/>
रहीं कछु नहिं बोलें ॥ अनसूया तब मन दृढ़कीन्हो ।<lb/>
सहाराजको उत्तर दीन्हो ४७ ॥<lb/>
घनाक्षरी । जाके तेज होत न अनीति कहूं नीति<lb/>
कहो पानी एक घाट में पियत सिंह गाय है । जप तप<lb/>
करत तपसी निर्भय तपोबनमें दानव सकत नहिं आय<lb/>
है ॥ काहू न सताई यह भोरीसी शकुन्तला उड़िकेसो<lb/>
भ्रमरी भाजी भौन को डराय है । अति ही अभीत म-<lb/>
हाराज श्री दुष्यंत ताके राज में ऋषिन कौन सकत<lb/>
सताय है ॥ ४८ ॥<lb/>
दोहा । शकुन्तला सों ताकि तब पूछी यह महिपाल ॥<lb/>
कहो तिहारे कुशलहैं छोटे द्रुम मृगबाल ४९ ॥<lb/>
कम्प बढ़यो तन कंटकित मुखते कढ़तनबैन ॥<lb/>
जकिसीरहीशकुन्तलानिरखिनृपतिभरिनैन ५०<lb/>
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चौपाई । शकुन्तला को बोलि न आयो । अनसूया<lb/>
यह नृपहि सुनायो ॥ क्यों न होय अब कुशल हमारी ।<lb/>
तुमसे साधु करत रखवारी ॥ प्यादे श्रम करि तुम यहँ<lb/>
आये । श्रम जल कत आनन में छाये ॥ शीतल छांह<lb/>
सघन तरु डारैं । बैठो इत हम पायँ पखारैं ॥ लखे भा-<lb/>
ग्य ते चरण तिहारे । आजु दिवस तुम अतिथि हमारे ॥<lb/>
शकुन्तला क्यों भई अयानी । ल्याउ पियन को शीतल<lb/>
पानी ॥ तब नृप बैन मैन रस साने । देखत ही हम<lb/>
तुम्हें अघाने ॥ मधुर मधुर कहती तुम बानी । यही<lb/>
हमारी है मिजमानी ॥ तुमहूं थकी सलिल के सींचे ।<lb/>
बैठो घरिकद्रुमनिके नीचे ॥ तब बोली अनसूया बांकी ।<lb/>
बिहँसति शकुन्तला को ताकी ॥ अद्भुत आज अतिथि<lb/>
जो आये । सिगरे कहत बचन मन भाये ॥ इन कर डर<lb/>
न कछू मन आनो । इन को कहो उचित के मानो ॥<lb/>
यह सुनि शकुन्तला छाया में । बैठी मोहि नृपति माया<lb/>
में ॥ शकुन्तला के हिय में पैठ्यो । क्षितिपालौ छाया<lb/>
में बैठयो ५१ ॥<lb/>
घनाक्षरी छन्द । भागन तें बन में दुहुन भट भेरो<lb/>
भयो खोलो भगवान आज दुहुन को भालु है । दोऊ<lb/>
दुहूं देखत अघात न द्युननई लगन को दुहुनके शाल्यौ<lb/>
उर शाल है ॥ मन में दुहुन के मनोज बान लागे संग<lb/>
एकै रंग एक दुहुन को भयो एक हाल है । हिये में<lb/>
महीप के शकुन्तला समानी सो शकुन्तला के हिये में<lb/>
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चौपाई । दोऊ सखी दुहून निहारे । कोटि काम रति<lb/>
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की छबि वारे ॥ शकुन्तला करि नैन लजोहें । निरखति<lb/>
नृपकों तकि तिरछोहें ॥ नृप मुखते यह वचन निकारो ।<lb/>
भलो बनो संयोग तिहारो ॥ एकै रूप बैस एकै हो । देहैं<lb/>
तीनि प्रान एकै हो ॥ या सुनि नृप की कछू न बोली ।<lb/>
अनसूया फिरि नृप सों बोली ॥ धनि यह देश जहां तुम<lb/>
आये । विघ्न होत ऋषि यज्ञ बचाये ॥ देव गन्धरव के<lb/>
मन्मथ हो । चले पियादे क्यों यह पथ हो ॥ करहु कृपा<lb/>
संदेह मिटाओ । नाम आपनो हमें बताओ ॥ तब नृप<lb/>
आपु न भेद छिपायो । कहो हमैं दुष्यन्त पठायो ॥ यह<lb/>
खिदमत करि देइ हमारी । ऋषि लोगन की बन रख<lb/>
वारी ॥ फिरत तपोबन में निशिबासर । नृप दुष्यन्त कर<lb/>
हों मैं चाकर ॥ कहिये बचन महीप चुपाने । अनसुय्या<lb/>
पुनि उत्तर ठाने ॥ अब ऋषि सर्वसनाथ कहाये । तुम<lb/>
से साधु तपोबन आये ॥ भलो आनि तुम दरशन<lb/>
दीन्हों । हम लोगन किरतारथ कीन्हों ॥ बतरस में अति<lb/>
ही सुख पायो । फिरि महीप यह बचन सुनायो ॥ शकु-<lb/>
न्तला यह सखी तिहारी । बिधि अतिही सुकुमारि स-<lb/>
म्हारी ॥ मुनिवर याहि ब्याहि कहु दै हैं । कै अब यासों<lb/>
तप करवै हैं ॥ वाको अंगन है तप लायक । कहा<lb/>
विचार करो मुनि नायक ॥ तब अनसूया उत्तर दी-<lb/>
न्हो । कणव महामुनि यह प्रण कीन्हो ॥ शकुन्तला<lb/>
सम सुन्दर ह्वै है । करिहौं शकुन्तला जो कहि है ॥<lb/>
ऐसो बरु काहू लखि पैहौं । तबहीं याहि ब्याहि तहँ<lb/>
दैहौं ॥ अनसूया यह कही कहानी । शकुन्तला<lb/>
सुनि कै शरमानी ॥ यह सुनि कै बोल्यो अवनीपति ।<lb/>
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शकुन्तला की लखि तन दीपति ॥ पहिले बात बिचारि<lb/>
न लीन्ही । मुनि यह कठिन प्रतिज्ञा कीन्ही ॥ शकुन्त-<lb/>
ला जैसी है सुन्दर । कहो कहां मिलि है वैसोबर ॥ दूँ-<lb/>
ढ़ि जगत मुनिवर फिरि अइ है । शकुन्तला अनब्याही<lb/>
रहि है ॥ तब अनसूया फिरि हँसि बोली । खानि चतु-<lb/>
रता की मनु खोली ॥ जब बिरंचि नीके दिन ल्यावत ।<lb/>
मन बांछित बैठे घर आवत । तुम से साधु कृपा उर<lb/>
धरि हैं । सुफल प्रतिज्ञा मुनि की करि हैं ॥ नृप जब<lb/>
पाई सुनि यह बानी । शकुन्तला अतिही शरमानी ॥<lb/>
प्रियम्बदा बिहँसति आनन में । शकुन्तला के लगि<lb/>
कानन में ॥ कहो आज जाती तुम ब्याहीं । करिये कहा<lb/>
कण्व घर नाहीं ॥ शकुन्तला भरि नैन लजाही । लख-<lb/>
ति तिरीछे फिरि २ जाही ॥ राजा शकुन्तला पर अट-<lb/>
क्यौ । राजहि ढूंढत सब दल भटक्यौ ॥ आई फ़ौज<lb/>
निकट बज मारी । बन में शोर भयो अति भारी ॥<lb/>
सवैया । घोरनि की खुर थारनि की रज सों सिगरो<lb/>
नभ मंडल छायो । जंगली जीवनि घेरिवे को चहूं ओर<lb/>
करोलनि को मनु धायो ॥ खेलत फ़ौज समेत शिकार<lb/>
नजीक दुष्यन्त महीपति आयो । रे मृग आपने आपने<lb/>
बांधहुयों ऋषिलोगन शोर मचायो ॥<lb/>
चौपाई । सुनि यह शोर सबै अकुलानी । धक धक<lb/>
धरनि मुखनि कुम्हिलानी ॥ करन न पाए नृप यह लीला ।<lb/>
मन २ करत फ़ौजको गीला ॥ अनसूया भैरससों सानी ।<lb/>
यों कहि उठी नृपतिसों बानी ॥ कंपन लागी डरसों छाती ।<lb/>
अब हम सब आश्रमको जाती ॥ श्रमकरि तुम आये आ-<lb/>
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श्रमको । उचित तिहारी सेवा हमको ॥ सेवा हम कीन्हे बि<lb/>
नु जातीं । यह बिनती हम करत लजातीं ॥ दोष हमारो<lb/>
मन नहिं कीजै । एक बार फिरि दरशन दीजै ॥ शकुन्त-<lb/>
ला को कर सों गहि कै । चलीं सखी यह नृप सों कहि<lb/>
कै ॥ फैली तनमन ब्याकुलताई । राजा चल्यो फ़ौज<lb/>
यह आई ॥<lb/>
दोहा । तनु आगे मनु जातु है शकुन्तला तनु जातु ।<lb/>
सन्मुख पौन निशान पट पीछे ज्यों फहरातु ॥<lb/>
याबिधि अतिही दुचितह्वै उतैचल्यो महिपाल ।<lb/>
शकुन्तलाको इत चलतभयो निपट बेहाल ॥<lb/>
घनाक्षरी छन्द । उरझोई द्रुमन दुकूल सुरझावे लो<lb/>
ग काढ़नि लागति कंटक बहु पगनि सों । कबहूं निवा<lb/>
ज खुले केशन कसन में कबहूं अंगिरान लागति अं-<lb/>
गनि सों ॥ ऐसे छल छिद्र कै कै ठाढ़ी ह्वैरहति शकुन्त-<lb/>
ला निपट भई ब्याकुल लगनिसों । सखियन की नज़रि<lb/>
निवारि नारि फेरि फेरि महिपालहि देखे द्रगन सों । ५८ ॥<lb/>
इतिश्रीसुधातरंगिणयां शकुन्तला नाटके प्रथमोङ्कः १ ॥<lb/>
अथ द्वितीयोङ्कः ॥<lb/>
चौपाई । या विधि नृपसों लगनि लगाई । शकुं-<lb/>
तला आश्रम में आई ॥ प्रन प्रन पति शृंगार सिधारे ।<lb/>
सूने से सब अंग निहारे ॥ दिनभर भूख प्यास नहिं<lb/>
लागे । परति न नींद राति भरि जागे ॥ सकुचि सखिन<lb/>
हूं सों नहिं भाखे । हियकी पीर हियेमें राखे १ ॥<lb/>
सोरठा । लगी कटारी तीर पीरलेत सहि शूरमा ॥<lb/>
नयेबिरहकी पीर काहू सों सहिजात नहिं २ ॥<lb/>
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कही न मानै कोय जैसी पीर बियोगकी ॥<lb/>
जापै बीती होय सोई जानै समुझि कै ३ ॥<lb/>
दृगबरसत ज्यों मेह बैठतजाय एकान्तघर ॥<lb/>
पियरानी सब देह तहूंदुरावति सखिनसों ४ ॥<lb/>
उरभरिरहयो सनेह लागी आगि बियोगकी ॥<lb/>
मनो बुझावत देह अँशुवनकी झरलायकै ॥<lb/>
दोहा । वा दिनते यह ह्वैगयो शकुन्तला को हाल ॥<lb/>
जादिनतेउतनीनजरि देख्योनहिंमहिपाल ६४ ॥<lb/>
चौपाई । महीपाल अति ब्याकुल रहैं। पी रहियेकी<lb/>
कासों कहैं ॥ शकुन्तला सों मन अटकायो । राजकाज<lb/>
अब सब बिसरायो ॥ नई लगन घर जान न दीन्हों ।<lb/>
डेरा निकट तपोबन कीन्हों ॥ कल न परै निशि दिन<lb/>
महिपालै । शकुन्तला सुधि हियमें शालै ॥ मुनिलोगन<lb/>
को डर मन तिनको । नेक न मिटत मरोरा मन को ॥<lb/>
बिरह अग्नि सों तावत तनको । नृप यों गिल्ला करत<lb/>
मदन को ॥ रे रे मदन महा अपराधी । निपट अनीति<lb/>
आनिते बांधी ॥ मनते उपजि मनोज कहावत । तिहिमन<lb/>
को तू कहा जरावत ॥<lb/>
सोरठा । शंभु नयनकी आगि बड़वानलज्यों समुद्र में ।<lb/>
रही सो तो में लागि तू हमको तासों दहत ॥<lb/>
दोहा । निन्दा करि यों मदन की देखिजुन्हैयाराति ।<lb/>
निंदा अब शशिकी करनलाग्योनृप यहिभांति ॥<lb/>
सोरठा । बिरहिन देत जराय हत्याको शशि डरत नहिं ।<lb/>
तुम से पूतहि जाय सागर को सुख देत नहिं ॥<lb/>
हिये बढ़ावत दाहु सो वह दोष तुम्हैं नहीं ॥<lb/>
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करतपापयहराहुतुम्हैं जोछोड़तनिगलिके ११ ॥<lb/>
तुम्हें सुधानिधि नाउँ लोग कहत जे बावरे ।<lb/>
बारि दते सवठाउँ आगि जलन के छलनसों ॥<lb/>
दोहा । शकुन्तलाके बिरह सों ब्याकुल अतिमहिपाल ।<lb/>
एक दिवस कछु कहन को आये ह्वै मुनिबाल ॥<lb/>
चौपाई । ह्वै मुनि सिद्ध द्वार पर आये । सुनतहि<lb/>
राजा तुरत बुलाये ॥ आशिर्बाद दुहुन तब दीन्हों ।<lb/>
करि प्रणाम नृप आदर कीन्हों ॥ तब ऋषि बोलि<lb/>
उठे हैं दोनों । बिना कण्व यह बन है सूनों ॥ महाराज<lb/>
है यज्ञ हमारे । सो ह्वै सकतु न बिन रखवारे ॥ राक्षस<lb/>
बिघ्न करन को आवत । सब ऋषिलोगन आनि स-<lb/>
तावत ॥ कछुक दिनन तुम चलौ तपोवन । बिनती<lb/>
करी सकल ऋषि लोगन ॥ बन को चहत हतो नृप<lb/>
आयो । सुनि पुनि वचन बहुत सुख पायो ॥ बिनती<lb/>
करियों ऋषिन बुलायो । राजा हरषि तपोबन आयो ॥<lb/>
आपु अकेलो नृप धनुधारी । करत ऋषिन की बन<lb/>
रखवारी ॥ पैठ्यो-बिरह नृपति के मन में । ढूंढ़त शकु-<lb/>
न्तला को बन में ॥ ग्रीषम तरुन तेज तपि आयो ।<lb/>
तब नृप मन में यह ठहरायो ॥ शकुन्तला यह धूप<lb/>
बिकट में । बैठी नदी मालिनी तट में ॥ बिन देखे<lb/>
नृप धरत न धीरहि । आयो नदी मालिनी तीरहि ॥<lb/>
फूले कमल भ्रमर जहँ बोलत । शीतल पवन मन्द जहँ<lb/>
डोलत ॥ हरषि मोर पिक करत पुकारें । अति झुकिरहीं<lb/>
सघन तरु डारें ॥ शीतल सघन छांह जहँ पाई । कमल<lb/>
दलन की सेज बिछाई ॥ शकुन्तला तो पौढ़ी तामें ।<lb/>
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अतिही ब्याकुल बिरह बिथामें ॥ घिसि २के नितचंदन<lb/>
ल्यावे । दासि कमल दल पौन डुलावै ॥<lb/>
दी० । जारत बिरह महीप की ताहि कहत सरमाति ।<lb/>
करत बहानो सखिनसों शकुन्तला इहिभांति ॥<lb/>
चौपाई । ग्रीषम तरनि तेजतपि आयो । त्रियहिसो<lb/>
बन में दाह बढ़ायो ॥ उरमें दाह कहाँ लों सहिहों । तन<lb/>
कलपैहों जबमरिजैहों । शकुन्तला निदरति इमिप्राननि ।<lb/>
झनकपरी राजाके काननि ॥<lb/>
दोहा । पहुंचो नृपति तहीं जिते सुने दीन ये बैन ।<lb/>
बिरहिनि महा शकुन्तला देखि तबै भरि नैन ॥<lb/>
मनमलीन तनछीन अति पियरानो सब अंग ।<lb/>
दुखित भयो नृप देखि के शकुन्तलाको रंग ॥<lb/>
चौपाई । तब नृपके मनमें यह आई । अभे न दीजे<lb/>
इन्हें दिखाई ॥ रहे दुराइ द्रुमान दे गातन । सुनेश्रवण<lb/>
दै इनकी बातन ॥<lb/>
दोहा । यों कहि बनमें दुरिरहे नृपति द्रुमन की ओट ।<lb/>
शकुन्तला सखियान सों कहत बिरहकी चोट ॥<lb/>
चौपाई । जादिन तें वह बन रखवारो । दरशन देकें<lb/>
फिरन सिधारो ॥ ता दिन तें बिसरी सुख हांसी । हेत<lb/>
गहे दिन राति उदासी ॥ जरीजाति बिरहनके जारे ।<lb/>
कहत नहीं लाजनके मारे ॥<lb/>
दोहा । अनुसूया के बचन सुनि प्रियम्बदा करिखेद ।<lb/>
परगट ह्वै फूछन लगी शकुंताला सों भेद ॥<lb/>
चौपाई । सुन सखि है अब और न खोई । कै तें कै<lb/>
अब सखिहम दोई ॥ तैं हम ते अब कहा दुरावति ।<lb/>
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पीर हिये की क्यों न बतावति ॥ दिन दिन देह जाति<lb/>
दुबरानी । पियरानी सब अंग निशानी ॥ छिन छिन<lb/>
फैलति अंग छिनाई । घटत अकेली नहीं लुनाई ॥ दिन<lb/>
दुसहायहदशा तुम्हारी । निशि दिनछतिया फटैहमारी ॥<lb/>
दाह निहारे तनमें जेतो । तरनि तेज ताते नहिं तेतो ॥<lb/>
छोड़ो लाजकही यहमानो । हम सों करनो कहाबहानो ॥<lb/>
जियको रोग जानि जो लीजे । तो फिरि तैसो जतन<lb/>
करीजे ॥ यह सुनि दुभकीली अँखियन सों । बोली श-<lb/>
कुंतला सखियन सों ॥ तुम हो सखि प्राणहुते प्यारी ।<lb/>
दुख अरुसुखमें हौ नहिं न्यारी । विथा बड़ी यह कब<lb/>
लगि सहिहों । तुम सों छोड़ि कौन सोंकहिहों ॥ यातें मैं<lb/>
नकहत हों अजहूं । सुनि तब दुख ह्वैजैहै तुमहूं ॥ जब<lb/>
ते वह बन को रखवारी । तबहीं ते यह दशाहमारी ॥<lb/>
छिन भरि पीर टरत नहीं टारी । कै अब वाहि दिखाव<lb/>
हु प्यारी ॥ करो उपाय बेगहीं एरी । कैदैचुकौ तिलांज-<lb/>
लि मेरी ॥ इतनो कहत गरोभरि आयो । लगी लाज<lb/>
नीचो शिर नायो ॥ यह दुख जिय को सखिन सुनायो ।<lb/>
नृपश्रवणनिमें सुधा पियायो ॥ शकुन्तलायों बोलि चुपा<lb/>
नी । कही सखिन फिरि मीठी बानी ॥ अबहीं ह्वै है सब<lb/>
मन भायो । भले ठौर ते मन अटकायो ॥ आयो इत है<lb/>
बन रखवारो । राजा है वह प्राणनि प्यारो ॥ रक्षा को स<lb/>
ब ऋषिन बुलायो । फेरि तपोबन ही में आयो । देखो<lb/>
हम अति हौ दुबरानो । अंग २ को रँगपियरानो ॥ क-<lb/>
हत न कछू रहत मन मारे । भयो बिकल कछु बिरह<lb/>
तिहारे ॥ लिखो एक लिखि पठवो वाकों । परगट करि<lb/>
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निज बिरह बिथाकों ॥ दशा तिहारी जो सुनि पैहै ।<lb/>
तुरत तिहारे ढिग चलि अैहै ॥<lb/>
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बोली बहुरि सखीन सों शकुन्तला सरमाय ॥<lb/>
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मिटत न जीको ॥ परगट ह्वै हो छोड़ति लाजनि । लेखी<lb/>
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मन कीन्हो । अनसूया फिरि उत्तर दीन्हो ॥ शकुन्तला तैं<lb/>
क्यों बौरानी । अनमिल कहति कहा ते बानी ॥ देखि<lb/>
आपने घर धन आवत । कोऊ कहूं किवार दिवावत ॥<lb/>
शीतल किरन चंद की लागे । कौन ओट दै राखत<lb/>
आगे ॥ इती कौन में मूरखता है । तैं जिहि चाहे सो<lb/>
तुहि चाहे ॥ लगनि तिहारी जो नृपजाने । धन्य भाग्य<lb/>
अपनो किर माने ॥ कागद कलम दवाइत नाहीं । सुनो<lb/>
श्रवण करि मेरी याहीं ॥ भली २ करि मनमें बातन ।<lb/>
नख सों लिखी कमल के पातन ॥<lb/>
दोहा । सुनिये बैन शुकुन्तला सुधि जिय में ठहराय ।<lb/>
पाती पंकज पात की नख सोंलिखीबनाय ॥<lb/>
पाती लिखिफिरिसिखनसोंशकुन्तला मुखचाहिं ।<lb/>
कहन लगी कै सुनहु यहलिखतबनीकै नाहिं ॥<lb/>
चौपाई । सखी सुनन लागीं दे कानन । शकुन्तला<lb/>
खोल्यो तब आनन ॥<lb/>
सोरठा । कीजै कौन उपाय दया तुम्हारे है नहीं ।<lb/>
मन लै गये चुराय फेरि दिखाई देत नहिं ॥<lb/>
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कोमल सब अँग और रचे बरंचि बिचारिके ।<lb/>
हिरदे निपट, कठोर मन काहे ते ह्वै गयो ॥<lb/>
चौपाई । शकुन्तला यह सखिन सुनायो । राजा निक-<lb/>
सि द्रुमन ते आयो ॥ निकसि द्रुमन तें दरशन दीन्हो ।<lb/>
शकुन्तला सों उत्तर कीन्हो ॥<lb/>
सोरठा । निशिदिन रहत अचेंत घर जैबो भारूंभयो ।<lb/>
एक तिहारे हेत बनवासी हम हूं भये ॥<lb/>
चौपाई । यह कहि नृपति निकट चलिआयो । देखि<lb/>
सखिन अतिही सुख पायो ॥<lb/>
दोहा । लागी उठन शकुंतला आदर कीरबे काज ।<lb/>
छीन अंग तब देखिके यों बोल्यो महराज ॥<lb/>
चोपाई । अतिही दुर्बल देह तिहारी । माफ तुम्हे<lb/>
ताजीम हमारी ॥ देखि दुसहू यह दाह तिहारो । मन<lb/>
मलीन ह्वै गयो हमारो । पौढ़ीं रहो गेह हम नारी ।<lb/>
करें उताहिल जतन तुम्हारी ॥ हियो गयो भरि आ-<lb/>
नँद अतिसों । प्रियम्बदा बोली छिति पतिसों ॥ भले<lb/>
आज तुम अवसर आये । तुम सिगरे दुख आनि<lb/>
मिटाये ॥ तुमसे वेद खबरि अब लेहैं । शकुंतला तनु<lb/>
दाह न रहि हैं ॥ बैठो निकट गहो अब नारी । लखे<lb/>
वेदई आज तिहारी ॥<lb/>
दोहा । यों कहि तब मुसक्याय नृप बैठो वाही ठोर ।<lb/>
रही लजाय शकुंलैला लखति सखिन की ओर ॥<lb/>
चौपाई । प्रीति समान दुहुन की तोली । अनसूया<lb/>
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हम बिनती अब करतीं ॥ राजनि के होतीं बहुनारी ।<lb/>
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जरें सवतिया दाह कि जारी ॥ माई न बाप कुटुम्ब<lb/>
न भाई । शकुंतला बिधि दुखी बनाई ॥ तुमसों कछु<lb/>
जो निरादर ह्वैहै । शकुन्तला पुनि जियत न रहि<lb/>
है ॥ अनसूया कीह बचन चुपानी । कही महीपति<lb/>
फिर यह बानी ॥ तुमहूं अब लगि मोहिं न जानो । मैं<lb/>
बनाय यह होत बिकानो ॥जे घर मेरे हैं बहुतेरी ।<lb/>
शकुन्तला की हैं सब चेरी ॥ शकुन्तला यह सखी ति-<lb/>
हारी । मोहिं लगति प्राणनि ते प्यारी ॥ जब ते वह<lb/>
भरि दीठि निहारी । तब सुधि बुधि सबे बिसारी ॥<lb/>
मोहिं कछू अब घर जो सुहातो । मैं अबलों का घरै न<lb/>
जातो ॥ शकुन्तला जो मोहिं न बरिहै । अपनो मोहिं<lb/>
दास तो करिहै ॥ शकुन्तला बिन घरै न जैहौं । शकु-<lb/>
न्तला को दास कहैहौं ॥ कही बातराजा अति नीकी ।<lb/>
निसांभई सखियन के जीकी ॥<lb/>
दोहा । विहँसी नृपकी ओर लखि, शकुंतला के गात ।<lb/>
अनसूया सों कहि उठी प्रियंबदा यह बात ॥<lb/>
सोरठा । भूखे हैं मृगबाल ढूंढ़त हैं निज माय को ।<lb/>
चलो सखी उठिहाल दीजे तिन्हेंमिलापअब ॥<lb/>
चौपाई । चलीं सखीं दोऊ छल करिके । शकुंतला<lb/>
बोली तब उठिके ॥ दइयहु को तुम नहीं डरातीं । मोहिं<lb/>
कहाँ छोड़े अब जातीं । घरिकु रहो पियपास अकेलीं ।<lb/>
यों कहिके टरि गई सहेलीं ॥ शकुंतला तब उठी अक-<lb/>
सिके । राजा गही बाँह तब हँसिके ॥ दिन दुपहर यह<lb/>
तपतु अनैसो । चाह तुम्हारो तन में ऐसो ॥ ऐसोठौर<lb/>
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से सेवक निकट तिहारे । कहा सखिन के होत सिधारे ॥<lb/>
तुमकहँ मोकहँ सोंपसिधारी । वे दोऊ प्रिय सखींनिहारी ॥<lb/>
सखियनकी अब शोध न लीजे । जो कछु होय सो हम<lb/>
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शीतल पवन डुलाऊं ॥ यह कहिके नृप करी ढिठाई ।<lb/>
कर गहि शकुंतला बैठाई ॥ धक धक छतिया लागी<lb/>
डोलें । शकुंतला लागी फिरि बोलें ॥ महाराज यह उ-<lb/>
चित नहीं है । कहा हमारी बांह गही है ॥ बापहमारो<lb/>
है घर नाहीं । अरु अबलों हमहैं अनब्याहीं ॥ और<lb/>
ब्याह अब नहिं अमिलाखो । हम तुमको मनमें करि<lb/>
राखो ॥ बाप हमारो जब घर ऐहै । तुमको हमें ब्याहि<lb/>
तब दैहै ॥ अबलों तुम हमसे नहिं ब्याहे । मोहिं कलंक<lb/>
लगावत काहे ॥ शकुन्तला यों देखि डरानी । बोल्यो<lb/>
फेरि महीपति बानी ॥<lb/>
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हैं निपट सयाने ॥ तीरथ न्हाय जबै मुनि ऐहैं । यहसुनि<lb/>
के बहुतै सुख पैहैं । जबलों बातकही नृप येती । करी<lb/>
काम केती कमनैती ॥ शकुन्तला लाजहिं भरिआई ।<lb/>
गहिकर नृपबर गरे लगाई ॥ कस्सों नृप छतिया गहि<lb/>
मसकी । शकुन्तला लीन्ही तब ससकी ॥ चुम्बन कियो-<lb/>
नृपति मन मायो । शकुन्तला मुख झझकि छुड़ायो ॥<lb/>
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शीतल पवन मंद वहि आयो । सधन बायुमें सुरति<lb/>
मचायो ॥ उरलाग्यो अधरन रस चहुंके । शकुन्तला<lb/>
कोयल सी कुहुंके ॥ भरि दुपहरियों सुरति मचाई । बातें<lb/>
कहत सांझ ह्वै आई ॥ देखि गौतमीको उठिधाईं । दोऊ<lb/>
सखी कहन यों आई ॥ पियकी हरबर करो बिदाई ।<lb/>
फुफी गौतमी निकटहिं आई ॥ शकुन्तला सुनि निपट<lb/>
डरानी । बोलि उठी नृपसों फिरि बानी ॥ दुरहू द्रुमनमें<lb/>
प्रेमपियारे । हमते फेरि भये तुमन्यारे ॥ फुफी गौतमी<lb/>
अब इत ऐहै । कर गहि मोहिं धरै लैजैहै ॥ इततेकहो<lb/>
कहाँ तुम जैहो । हमहिं फेरि कब दरशनदैहो । दरश-<lb/>
नहीं जोहरबरे दैहो । हमें फेरि तुम जियत न पैहो ॥<lb/>
ऐसी कछू निसानी दीजे । जाहिदेखि मन धीरज कीजे ॥<lb/>
शकुन्तला ये बैन सुनाये । नृपके नैन सजल ह्वै आये ॥<lb/>
तब नृप खोलि अंगूठी लीन्ही । शकुन्तलाकेकरमेंदीन्ही ॥<lb/>
और बात नृप कहन न पाई । निपट नगीच गौतमी<lb/>
आई ॥ चलत गौतमीको पगबाज्यो । सुनि नृप दुरयो<lb/>
द्रुमन में भाज्यो ॥ शकुन्तला फिरि दुखभरि आई । पौढ़ि<lb/>
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शकुन्तला गहि गरे लगाई ॥ पूछनि लगी गौतमी बा-<lb/>
तनि । अबकछु दाह घटो तव गातनि ॥ शकुन्तला<lb/>
यह वचन कहयो तब । कछु बिशेष भयो तोहै अब ॥<lb/>
तब गहि शकुंतला के करको ।ह्वाँते चली गौतमी घर<lb/>
को ॥ शकुन्तला निज आश्रम आई । नृप दुखसागर<lb/>
थाह न पाई ॥ शकुंन्तला सँग जहँ सुखपायो । वाहीठौर<lb/>
फेरि नृप आयो ॥ सूनी सेज कमल दलवारी । देखि<lb/>
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भयो नृपके दुखभारी ॥ बिरह ताप चढ़ि आयो तनमें<lb/>
नृप यों शोचन लाग्यो बनमें ॥ कहाँ जाऊँ कैसे सुख<lb/>
पाऊं । यह दुख गाढ्यो काहि सुनाऊं ॥ अघ यों कब<lb/>
फिरि दरशन पैहौं । तबलों यहदुख कैसे सहिहौं ॥ ज्यों २<lb/>
लखत सेज यह सूनी । त्यों त्यों बढ़त पीर उर दूनी ॥<lb/>
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चायो ॥ महराज क्यों सुधि घिसराई । जित तित दानव<lb/>
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रत बियोगी नृप उठिधायो ॥ हित में भयो बितज अति<lb/>
भारी । फेरि करनलाग्यो रखवारी ॥<lb/>
इतिश्रीशकुंतलानाटकोद्वितीयोङ्कह २ ॥<lb/>
अथ तृतीयोङ्कः ॥<lb/>
चौपाई । पकरि गोतमी आश्रम आई । बिरह ल-<lb/>
तनि में अतिही छाई ॥ बथा बिरह की सही न जाई ।<lb/>
शकुंतला सुधि बुधि बिसराई ॥ संग सखी तन कोउ न<lb/>
भावे । बैठि एकांत दृगनि बरसावे ॥ बिनदेखे कल नेक<lb/>
न पावे । घरी २ ज्यों बरस बितावे ॥ सूनो सो सबरो<lb/>
जग लेखति । धरेध्यान पिय मूरति देखति ॥ आईसुधि<lb/>
पीतम कीरतिकी । तबै अंगूठी देखी नृपकी ॥<lb/>
घनाक्षरी । सुधि और सब कौन समुझावे वाके उर<lb/>
कछु नहिं भावे न सहेली कोऊ साथमें । अतिही दुखित<lb/>
शिरनाये सूने सदन में बैठी प्यारी धरिके बदन बाम<lb/>
हाथ में ॥ चित्र कैसी लिखि नेक डोलति न बोलति न<lb/>
दुखनकी मोट धरिदीन्ही बिधि माथमें । सुनत बात<lb/>
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सूने से ह्वैगये सकल गात बैठी ध्यान कीन्हे मन दीन्हे<lb/>
प्राणनाथ में २ ॥<lb/>
चौपाई । शकुंतलायोंमनअटकायो । मुनिदुर्वासाआश्रम आयो ३ ॥<lb/>
सवैया । पिय ध्यान में बैठी शकुंतलाहै ऋषि आय<lb/>
गयो अनचाह्योई चाह्यो । नहिं शासन बूझि कै आसन<lb/>
दीन्हों न आदर सों कछु बैन कह्यो ॥ तबयों दुर्वासा<lb/>
रिसाइकह्यो जिहिको यहि भांति तू ध्यान धरयो । सुधि<lb/>
तेरीनसो करिहै कबहूं यह शाप सिताब देजातरह्यो ४ ॥<lb/>
सवैया । बोल सुनो न ऋषीश्वरको न ऋषीश्वरकी<lb/>
निरखी परछाहीं । ध्यानधरे जुहती चित में तिय ध्यान<lb/>
धरेही रही चितमाहीं ॥ क्रोधी महा दुर्वासा ऋषीश्वर<lb/>
दीन्हों है शाप पसारि के बाहीं । आयो कभे कब जातु<lb/>
रह्यो यह नेक शकुंतलाको सुधिनाहीं ५ ॥<lb/>
चौपाई । सुनत शाप सखियां उठिधाईं । हरबर दु-<lb/>
र्वासा ढिगआईं ॥ भयो सखिन के जिय दुख गाढ़यो ।<lb/>
पांय पकरि कीन्हों मुनि ठाढ़यो ॥ शकुंतलाके नेहु नि-<lb/>
हारे । बिनती लगींकरे करजोरे ॥ क्रोध ईतनो तुम्हरे<lb/>
लायक । यह अपराध क्षमो मुनिनायक ॥ करो न क्रोध<lb/>
दया मन ल्यावहुा । करहुकृपा यह शाप मिटावहु ॥ यह<lb/>
बिनती मनधरहु हमारी । कण्व सुता सो सुता तुम्हारी ॥<lb/>
दोऊ सखिन कही यह बानी । सुनि किरपा कछु मुनि मनआ<lb/>
नी ॥ राजागयो अंगूठीदैहै । बाहि लखतही फिरि सुधिह्वैहै ॥<lb/>
यह बिधि छूटयो शाप हमारो । यह कहिके मुनि फेरि<lb/>
सिधारो ॥ छूटो शाप हरष भयो गातन । दोऊ सखी<lb/>
लगीं फिर बातन ॥ जो मुनि कही सो है नहिं झूंठी ।<lb/>
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शकुंतलहि नृपदई अंगूठी ॥ जब नृपको बे सुधि करि<lb/>
पावे । वहै अंगूठी वाहि दिखावे ॥ काहू सों न कहो<lb/>
नहिं मानै । हमैं तुम्हैं यह शापहि जानै ॥ शकुन्तला<lb/>
जो कछु सुनि पैहै । कवनिहुं जतन न जीवति रहि है ॥<lb/>
योंकहिके बातें दुखहाईं । दोऊ शकुंतला ढिग आईं ६ ॥<lb/>
दोहा । निरखति नैननसों कछू कछू सुनित नहिंकान ।<lb/>
निहँचलचित्त शकुतंला बैठिकरति पियध्यान ७ ॥<lb/>
चौपाई ॥ शकुंतला यों दिबस बितावति । राजा<lb/>
हिये न कछु सुधि आवति ॥ मुनिन बिदा करि दीन्हों<lb/>
राजहि । गयो आपने राज समाजहि ॥ शापगयो मुनि<lb/>
दे दुखदाई । शकुंतला की सुधि बिसराई ॥ बहुतकाल<lb/>
इहि भांति बितायो । शकुंतला उरगर्भ जनायो ॥ नीक<lb/>
न लगति देह दुबरानी । अंगअंगकी छबि पियरानी ॥<lb/>
आलस आनि चित्तमें छाये । उतस्यो बदन उससि<lb/>
उर आयो ॥ नेह पीछलो नृप बिसरायो । तीरथन्हाय<lb/>
कण्व मुनि आयो ८ ॥<lb/>
दोहा । कछुक दिनन में कण्व मुनि आयो तीरथन्हाय ।<lb/>
शकुंतला निजगर्भसों मुनिकोलखत लजाय ९ ॥<lb/>
चौपाई । मुनि वर होमकरन लागेजब । भईअग्नि<lb/>
ते बानी यह तब १० ॥<lb/>
दोहा । व्यहि नृप दुष्यंतको करि गंधर्व बिवाह ।<lb/>
शकुंतलाहै गर्भसों भलोभयो मुनि नाह ११ ॥<lb/>
चौपाई । कढ़ी अग्निते जब यह बानी । सुनि के<lb/>
मुनिवर आनँद ठानी ॥ करीहोम बिधि मुनि मनभाई ।<lb/>
शकुतंला मुनि तुरत बुलाई ॥ लाजहि नख शिख अंग<lb/>
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छिपाये । आई शकुंतला शिर नाये ॥ शकुंतला ढिगमें<lb/>
बैठाई । करन लगे मुनि बहुत बड़ाई ॥ बड़ो मोहिं ते<lb/>
सुख यह दीन्हों । अतिही मोहिं सुचित करि लीन्हों ॥<lb/>
चक्रवर्ति सुत में बरु दीन्हों । जित ते ब्याह गंधरब<lb/>
कीन्हों ॥ मैं अवलोकत दर्व न रहिहों । भोरतोहिं सा-<lb/>
सुरे पठैहों ॥ शकुंतलाको सुनि ससुरासी । भई सखिन<lb/>
के चित्त उदासी ॥ निरखि सखिन के मुख मुरझाये ।<lb/>
शकुंतला के दृग भरि आये ॥ भयो भोर रवि दई दि-<lb/>
खाई । शिरते शकुंतला अन्हवाई ॥ बिदा समै मुनि<lb/>
कण्व बुलाये । सब ऋषि बधू मिलनको आये ॥ मुनि<lb/>
ससुरारहि देत पठाये । शकुंतला सिसकति शिरनाये ॥<lb/>
बैठीं घेरि सकल ऋषि नारी । लगीं अशीषें देने प्या-<lb/>
री ॥ प्रान समान होहु पति प्यारी । लखि लखि सौतें<lb/>
जरहि तिहारी ॥ सुत सपूत ह्वै है घर जाता । सुखसा-<lb/>
गर में रहो समाता ॥ ये बातें कहिके हितकारी । घर<lb/>
अपने मुनि बधू सिधारी ॥ शकुंतला ढिग और न कोऊ ।<lb/>
कै गौतमि कै सखियां दोऊ ॥ शकुंतला अंशुवन भरि<lb/>
आई । गही गौतमी गोद बिठाई ॥ बडी बेरलों गूंथि<lb/>
बनाई । फूलमाल सखियन पहिराई ॥ कासों कहें कहां<lb/>
ते ल्यवें । गहनो नहीं कहा पहिरावें ॥ भरि भरि दुहूं<lb/>
दृगन जल मोचें । दोऊ सखी दुखित ह्वै शोचें ॥ भूषण<lb/>
बसन सबै हम ल्याये । द्वैमुनि बालक गहनो ल्याये ॥<lb/>
गहने को जिनि शोक बढ़ावहु । लेहु ललित गहनो<lb/>
पहरावहु ॥ गहनो देखि सखिन सुखपायो । कहन लगी<lb/>
किततें यह आयो १२<lb/>
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दोहा । देखि अचंभौ सबन को दोऊ तब मुनिबाल ।<lb/>
कहन लगे यहभांति हैं इह गहनेके हाल १३ ॥<lb/>
घनाक्षरी । कण्व गुरु हमको पठायो कै शकुंतला<lb/>
को फूल तोरि ल्याउ फूल माला पहिराउ आनि । हम<lb/>
गये फूल तोरें और गति भईं तब सिद्धि है गुरू की<lb/>
वह हमको परति जानि ॥ काहूं पाये पानकाहूं काजर<lb/>
ललित काहूं काहूं महाउर काहूं सेंदुर सुहाग बानि ।<lb/>
रूखन के भीतर हाथन निकासि गहि भूखन बसन<lb/>
हमें दीन्हें बन देवतानि १४ ॥<lb/>
चौपाई । सुनि गौतमी सगुन ठहरायो । शकुंतलहि<lb/>
गहनो पहिरायो ॥ सेंदुर सखियन मांग चढ़ायो । का-<lb/>
जर नैनन माहिं लगायो ॥ जावक रंग पगनि झलका-<lb/>
वो । चुनि चटकीलो पट पहिराय ॥ बीरी सखिन बनाइ<lb/>
खबाई । शकुंतला दुलहिन बनि आई ॥ जब लों यह<lb/>
शृंगार बनायो । तब लों न्हाय कण्व मुनि आयो ॥<lb/>
शकुंतला को दुख रमि जागो । मुनि मन माह िंकहन<lb/>
यों लाग्यो १५ ॥<lb/>
छन्द । धरत न धीर गरो भरि भरि आवतहै निकसि<lb/>
निकसि नीर आवत दृगनि में । हरष हिरानो जात कछू न<lb/>
सुहात तन मन अकुलात योंरहो नजात बनमें ॥ आजु<lb/>
ससुरारि को शकुंतला सिधारेगी सो याही शोच सकुच<lb/>
सँभारन तन में । मेरे बनवासी के भयोहै दुख एतोदुख<lb/>
केतेहोत हवैहै घरबासिन के मन में ॥ १६ ॥<lb/>
चौपाई । यह मुनि मन में मोह बढ़ायो । शकुंतला<lb/>
के ढिग चलि आयो ॥ बापहि देखि मोह सों पागी ।<lb/>
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शकुंतला तब रोवन लागी ॥ दुखतें नीर रह्यो भरि<lb/>
नैननि । बोल्यो पुनि मुनि गद्गद बैननि ॥ मंगल<lb/>
है पियके घर जैबो । अब या समय उचित नहिंरुइ-<lb/>
बो ॥ क्यों गौतमी नाहिं समुझावति । शकुंतला यों<lb/>
रोवनि पावति ॥ है शुभघरी बिलम्ब न लावहु । अब<lb/>
हीं ह्यांतें याहि पठावहु ॥ यों कहि मुनि ह्वै शिष्य बु-<lb/>
लाये । शकंतला सँग को ठहराये ॥ गहि बहियां गौत-<lb/>
मी उठाई । शकुंतला ससुरारि पठाई १७ ॥<lb/>
दोहा । पोंछति दृग सुसकति चली शकुंतला ससुरारी ।<lb/>
तबसबरेबनद्रुमनसों मुनियोंकह्योपुकारि १८ ॥<lb/>
घनाक्षरी । फूलति तुम्हैं निहारि ऐसे उर फुलतिहो<lb/>
सुत के भये तें फूल होत जैसे नारि को । क्यारीं आल<lb/>
बालनि बनावति रहतींयाही श्रम में बितावतीं हुतीं जो<lb/>
वार पहेर चारि को ॥ जबलों पहिले तुम्हें न सींचिले<lb/>
ती हुती तबलों न कबहूं जो पियत हुती वारिको । सेवा<lb/>
इहि भांति जो करति ही तिहारी सोई सुनिये शकंतला<lb/>
सिधारी ससुरारिको १९ ॥<lb/>
चौपाई । मुनिवर यह बन द्रुमन सुनायो । पिकनि<lb/>
द्रुमनि चढ़ि शोर मचायो ॥ कोयल कुंहकति चढ़ि चढ़ि<lb/>
डारिन । मनुद्रुमवतवत करत पुकारन ॥ देखि रही अ-<lb/>
पने द्रुमलाये । शकुंतलाके दृग भरिआये ॥ शकुंतला<lb/>
यह शोक समानी । सखियन सों बोली यह बानी ॥<lb/>
लाग्यो जड़ नृप नेहु निगोड़ो । मोपै जात नहीं बन<lb/>
छोड़ो ॥ मेरो लाई द्रुम अरु पाती । देखे दुख भरिआ-<lb/>
वत छाती ॥ अब सेवा नाहीं हेमोपे । येद्रुम जात तुम्हें<lb/>
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को सौंपे ॥ यह सुन के भरिआईं अँखियां । बोलि उठी<lb/>
तब दोऊ सखियां ॥ कहा सौंपती ये द्रुम पाती । हमैं<lb/>
काहि तुम सौंपेजाती ॥ योंकहि परम प्रेमसों पागी ।<lb/>
सखी शोरकै रोवन लागी ॥ मया सखिन के अति हिय<lb/>
बाढ़ी । शकुंतला रोवतिहै ठाढ़ी ॥ बड़ी बेरलों मुनिस-<lb/>
मुझाई । शकुंतला आगे चलिआई ॥ शकुंतला मग<lb/>
फेरि सिधारी । भयो सकल बनके दुखभारी ॥ नाचनि<lb/>
मोरनि ने बिसराई । उगिलत घास हरिण अधखाई ॥<lb/>
रह्यो चकित ह्वै पवन न डोलत । दुखित भ्रमर गुंजत<lb/>
नहिं बोलत ॥ जितनो जानि हतो बनबासी । सबही<lb/>
के तन भई उदासी ॥ सब बनमें छाई बिकलाई । शकुं-<lb/>
तला कोसुक चलि आई ॥ पहरुक तबलों दिन चढ़ि<lb/>
आयो । मुनिको यह गौतमी सुनायो ॥ देखो बड़ी बेर<lb/>
चढ़ि आई । शकुंतलाको करो बिदाई ॥ सीख होय सो<lb/>
याहि सिखावो । ठाढ़े होउन आगे आवो ॥ मुनिको भयो<lb/>
महा दुख गाढ़यो । भयो सबनको ले मुनिठाढ़यो २० ॥<lb/>
दोहा । शिष्यनिसों मुनिकहि उठे मन बिचारिठहराइ ।<lb/>
कहियोनृपदुष्यंतसों यहसँदेश समुझाइ २१ ॥<lb/>
चौपाई । हमहैं आश्रित राव तिहारे । तुमहौ रक्षक<lb/>
सदाहमारे ॥ शकुंतलाहै सुता हमारी । याहि जानियो जि-<lb/>
यते प्यारी ॥ हमैं न आश्रम आवनदीन्हों । आपहिं व्याह<lb/>
गंधरब कीन्हीं ॥ शकुंतला जुनसुख में रहिहै । यहदुख<lb/>
मोपै सहीनजैहै २२ ॥<lb/>
दोहा । नृप के हेत सँदेश के शिष्यन सों कहिबैन ।<lb/>
शूकुंतलाकोसीखतब लगोमहामुनिदेन २३ ॥<lb/>
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चौपाई । सासु ननँदकी सेवा करियो । पति के प्यार<lb/>
भूलि मति परियो ॥ सौतिनहूं में हिलिमिलि रहियो ।<lb/>
अपनो भेद न कबहूं कहियो ॥ भागन के न गरब मन<lb/>
धरियो । पति शासन ते नेक न टरियो ॥ यह बिधि तें<lb/>
पति के घर रहियो । सब घर सों कुल बधू कहैयो ॥ यह<lb/>
सिख सब मन में धरिलीजै । बन को मोहिं बिदा अब<lb/>
कीजै ॥ अपने संग गौतमी लीजे ॥ बिदा सखिनहूं की<lb/>
अब कीजे ॥ शकुंतला जल भरि अँशुवन को । रोवन<lb/>
लगी गरो गहि मुनिको ॥ मिलिके मुनिकी करी बिदाई ।<lb/>
शकुंतला सखियन ढिग आई ॥ सखियन मिलि गहि<lb/>
गरे लगाई । अँशुवनकी तब नदी बहाई ॥ बिछुरन के<lb/>
दुख महा समानी । बड़ी बेरलों रोय चुपानी ॥ जो<lb/>
सराप दुर्बासा दीन्हों । सो सखियन अपने मन कीन्हों ॥<lb/>
अनसूया तबकरि चतुराई । शकुंतला सों बातचलाई ॥<lb/>
अटकत चित्त बहुतकाजनिमें । सुधि वैसी नरहतिराजनि<lb/>
में ॥ समयो बीतिगयो बहुतेरी । नृप जो नेह बिसारे तेरो ॥<lb/>
जो नृप गयो अंगूठी दैहै । वाहि लखतही फिरि सुधि<lb/>
अैहै ॥ सुनि सखियातें जिनि बिसरावै । कहूं अँगूठी<lb/>
जानन पावै ॥ यह सुनि डरते छतिया डोली । शकुंतला<lb/>
सखियन सों बोली ॥ यह सँदेह ते मोहिं सुनायो । याको<lb/>
मैं कछु भेद न पायो ॥ अतिही गूढ़कहीं तेंबानीयह सुनि-<lb/>
केहौं निपट डरानी ॥ तब सखियन यह बचन सुनायो ।<lb/>
देखो दिन दुपहर हवै आयो ॥ बिदा होउ छोड़ो अब<lb/>
बाते । चलौ उताबल पहुंचो जाते २४ ॥<lb/>
दोहा । चले शिष्य आगे तबहिं शकुंतला के साथ ।<lb/>
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दोऊ सखियां संगलै उतैं चल्यो मुनिनाथ २५ ॥<lb/>
चौपाई । दोऊ सखियांफिरिफिरि देखों । सूनो सोंसबरों<lb/>
जग लेखें ॥ कछुक दूरि आगे तब डोली । हाथनि तो-<lb/>
ड़त फिरि यों बोली ॥ गई द्रुमन की ओट छिपाई ।<lb/>
शकुंतला नहिं देत दिखाई ॥ सखियन को आश्रम लै<lb/>
आयो । शकुंतला पति पुर नगिचायो २६ ॥<lb/>
दोहा । पति पुर मारग निकट में देख्यो भस्यो तलाव ।<lb/>
शकुंतला प्यासी भई गई तहां करि चाव २७ ॥<lb/>
चौपाई । पानी पियो प्यास तब भागी । शकुंतला मुंह<lb/>
धोवन लागी ॥ भयो बिनाश महा है पल मैं । करतें गिरी<lb/>
अंगूठी जल मैं ॥ गिरी अंगूठी जब जल माहीं । शकुंत-<lb/>
ला को कछु सुधि नाहीं २८ ॥<lb/>
दोहा । शिष्यनि सहित शकुंतला आई नृप के द्वार ।<lb/>
खिलवत में बैठी हतो तबनृप करि दरबार २९ ॥<lb/>
चौपाई । शिष्यनि की बातें सुनि लीन्हीं । खोजनिजाय<lb/>
खबरि तब दीहीं ॥ महाराज मुनि कण्व पठायो । शिष्य<lb/>
दोय द्वारे पर आये ॥ लीन्हे संगललित ह्वै नारी । करो<lb/>
चहत मन नजरि तिहारी ॥ नारि सुने नृप अचरज<lb/>
मानो । अतिही चिंता में चितु आनो ॥ निकरि यज्ञ<lb/>
शालामें आयो । मुनिके शिष्यनिकों बुलवायो ३० ॥<lb/>
दोहा । शिष्यनि पीछे गौतमी पैठी नृप के द्वार ।<lb/>
पीछे सबके ह्वैचली शकुन्तला दरबार ३१ ॥<lb/>
चौपाई । राजा करि सन्मान बुलाये । याबिधि शिष्य<lb/>
कणवके आये ॥ शकुन्तला लाजहि गहि गाढ़यो । आई<lb/>
पियघर घूंघट काढ़यो ॥ चढ़योअभाग्य आनितबजाग्यो ।<lb/>
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नैन दाहिनो फरकन लाग्यो ॥ यह असगुन तब आनि<lb/>
जनायो । शकुंतला के दुख भरिआयो ॥ दीठि पसारि<lb/>
बिसारि निमेखन । शकुंतला लागीं नृप देखन ॥ बिलखे<lb/>
अद्भुत रससों पाग्यो । मन मन नृपति कहनयोंलाग्यो ॥<lb/>
कोहैनारि कहां यह आई । बनमें मुनिन कहां यहपाई ॥<lb/>
जानिनपरतु कहां ये आये । यहांजाइ काहेको ल्याये ॥<lb/>
यहबिचारमनमेंनृपकीन्हों । आशिर्बादमुनिनतबदीन्हों<lb/>
दोहा । आसनते उठि दूरते कीन्हों नृपतिप्रणाम ॥<lb/>
क्षेमकुशल पूछनलग्योछोड़ि और सबकाम ३३ ॥<lb/>
महाराजके राजमें रह्यो न दुखको हेत ॥<lb/>
तपतु तरणिके तेज ते तुम न दिखाईदेत ३४ ॥<lb/>
चौपाई । कहोकुशल सब मुनि बन वारे । रहतकणव<lb/>
गुरु सुखित तिहारे ३५ ॥<lb/>
दोहा । जिनके आशिर्वादते लोगअमरह्वैजात ॥<lb/>
तिनसिद्धिनकेकुशलकीफौनचलावतबात ३६ ॥<lb/>
चौपाई । महाराज के ढिग हम आये । यह संदेश<lb/>
गुरू के लाये ॥ हमको बिदा गुरू जब कीन्हों । यह सं-<lb/>
देश तुमको कहिदीन्हों ॥ जानी हम सब बात तिहारी ।<lb/>
शकुंतला है सुता हमारी ॥ जोगन्धर्व व्याह तुमठानो ।<lb/>
सो हम कछू दुःख नहिं मानो ॥ महाराजमें हैं गुनजेते ।<lb/>
शकुंतलाहू में हैं तेते ॥ भलीभई सुनि हम सुख पायो ।<lb/>
विधि यह भल संयोग बनायो ॥ शकुंतला यह गर्भ स-<lb/>
हितहै । सुनि मुनि तुरत पठाई इतहै ॥ शकुंतला को<lb/>
घरमें राखो । मुनिका कहो संदेश सुभाखो ॥ शकुंतला<lb/>
हम इत पहुंचाई । हमको तुम अबकरो बिदाई ॥ मुनि<lb/>
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को शाप न मनते डोल्यो । बेसुधराजा फिरियों बोल्यो ॥<lb/>
मुनिके शिष्य प्रवीनमहाहो । तुम ये बातेंकरत कहाहो ॥<lb/>
शकुंतला किन व्याहीको है । मोहिं नहीं यह सुधि तनको<lb/>
है ॥ राजाकही कठिन यहबानी । सुनि शिष्यनने अति<lb/>
रिसठानी ॥ सुनि नृपबैन सबै सुधिभागी । शकुंतला कं-<lb/>
पन तबलागी ॥ नृपके बचन-धरमतेडोले । दोऊ शिष्य<lb/>
कोपि कै बोले ॥ महाराज कछु धरमहि जानो । ऐसो<lb/>
अधरम मति मन आनो ॥ कस्योव्याह तब करिछल<lb/>
घातें । अब्यो कहनलगे तुम बातें ॥ सोईकरत जो कछु<lb/>
मन आवत । राजालोगन पीरहि जानत ३७ ॥<lb/>
दोहा । राजाके सुनि बैनये निपट उठी अकुलाय ॥<lb/>
शकुतलासों गौतमी कहनलगी समुझाय ३८ ॥<lb/>
चौपाई । घरी एक छोड़ो तुम लाजहि । मुख उधार<lb/>
दिखरावहु राजहि ॥ मुखजो तिहारो देखनपावे । तोनृप<lb/>
को अबहीं सुधिआवे ॥ कहि गौतमी घुंघट खुलवायो ।<lb/>
शकुंतला मुख नृपहिं दिखायो ३९ ॥<lb/>
दोहा । पलकपसारि निहारितब शकुंतलाको रूप ॥<lb/>
नाहीं हां कछु करत नहिं रह्यो भूलिसो भूप ४०<lb/>
चौपाई । राजाजबकछु ओंठनखोले । मुनिके शिष्य<lb/>
फेरि पुनि बोले ॥ महाराज मनमें सुधिकीजै । अब हम<lb/>
को कछु उत्तरदीजै ॥ शकुंतला की लखि तन दीपति ।<lb/>
बोल्यो फिरयों बिसुधि महीपति ॥ बड़ी बेरलों सुधिकरि<lb/>
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यह ब्याहीं । मोहिं कछू सुधि आवतिनाहीं ॥ गर्भ स-<lb/>
हित यह नारि बिरानी । कैसे राखिसकौं करिरानी ॥ यह<lb/>
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सुनि शिष्य रिसनसों पाग्यो । या विधि नृपसों बोलन<lb/>
लाग्यो ॥ ऐसोपाप कहामन आनत । तुम ऋषिलोगन<lb/>
को नहिं जानत ॥ कण्व महामुनि जबरिसकरिहै । तुर-<lb/>
तहिं तुम्हैं जानि तब परिहै ४१ ॥<lb/>
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शकुंतलासोंशिष्यतबबोलेनिपटरिसाय १४२ ॥<lb/>
चौपाई । काहूकोतब बूझिनलीन्हों । आपहि व्याह<lb/>
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कछु उत्तरदीजै ॥ लाज छांड़ि अँखियनको खोली । श-<lb/>
कुंतला तब नृपसों बोली ॥ महाराजयह नीति कहाहै ।<lb/>
याते अधरम होतु महाहै ॥। यामें कहो कहातुम पावत ।<lb/>
क्यों बिन काज कलंक लगावत ॥ तब पहिले हमतुम्हें<lb/>
न जानति । कहो जु तुम कछु सो हम मानत ॥ तब<lb/>
वैसी करिके छल घातें । अब तुम कहत कहा ये बातें ॥<lb/>
बिदा होत तुम दई अंगूठी । यातेहौं हुइहौं नहिं झूंठी ॥<lb/>
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वों ॥ शकुन्तला योंबोलि चुपानी । राजा कही फेरि यह<lb/>
बानी ॥ यह तुम बात न्याय की कीन्ही । अबलों क्यों<lb/>
न अंगूठी दीन्ही ॥ जो मैं लेखन अंगूठी पाऊँ । तो मैं<lb/>
तुमहिं सांच ठहराऊं ॥ परसि अंगूठी केरि ठिकानो । श<lb/>
कुंतला को मुख पियरानो ॥ कर में तब न अंगूठी पाई ।<lb/>
हाय २ तिहि ठौर मचाई ॥ लै उसांस करि सजल निमे<lb/>
षनि । लगी गौतमी को फिरि देखनि ॥ शकुंतला अति<lb/>
ही शरमानी । राजा कही बिहँसि यह बानी ॥ त्रिय च-<lb/>
रित्र सुनि राखै बैननि । ते हम लखेआज निजनैननि ॥<lb/>
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मैंकब तोको दई अंगुठी । ऐसी बातकहतक्यों झूंठी ॥<lb/>
पर तिय ते मन बिमुख हमारो । चलि है कछु न प्रपंच<lb/>
तिहारो ॥ बिधि नृप के मन ते यों डोली । शकुंतला<lb/>
नृप सों पुनि बोली ॥ देखी मैं प्रभु की प्रभुताई । जिहि<lb/>
जिहि बिधि हों नाचनचाई ॥ नहीं अंगूठी कहा दिखाऊं ।<lb/>
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सबरी सुधि बिसराई ॥ यहू सुने सुधि मन नहिं आई ।<lb/>
राजा फिरि यह बात चलाई ॥ या विधि मीठी बातें करि<lb/>
कै । लेत त्रिया सब को मन हरिकै ॥ या बिधि अद्भुत<lb/>
बात बनाई । छू न गई मनु कहूं झुठाई ॥ यह सुनि मन<lb/>
में अति सतरानी । कही गौतमी नृप सों बानी ॥ महा<lb/>
राज तुम हौ बिशवासी । कपट कहा जानें बनबासी ॥<lb/>
कपट कहा हम सीखो बनमें । कपट होत राजनके मन<lb/>
में ॥ यों कहि कै गौतमी चुपानी । राजा फेरि कही यह<lb/>
बानी ॥ होत स्वभावहि ते चतुराई । सब नारिनमें हम<lb/>
ठहराई ॥ सुनहु न कोयल की चतुराई । करती कागनि<lb/>
सों ठगहाई ॥ काग हवाले सुत करि देती । बड़ो भये<lb/>
अपनो फिरि लेती ॥ राजा कही कठिन यह बानी। श-<lb/>
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कुंतला सुनि कै शरमानी ॥ कहा कहत हैरे अन्याई । तैं<lb/>
मोसों कीन्हीं ठगराई ॥ तब मैं तोहिं न ठग करि जान्यो ।<lb/>
जो तू कह्यो सो तब मैं मान्यो ॥ यों कहि नीचेशीश न-<lb/>
वायो । दुख भरि गयो गरो भरि आयो ॥ मुख को ढांकि<lb/>
दुखन सों पागी । शकुंतला तब रोवन लागी ॥ ओंठ दुहूं<lb/>
शिष्यन तब खोले । शकुंतला सों रिस करि बोले ॥ नेहु<lb/>
करत काभे न जनायो । जैसो कियो सो फल अब पायो ॥<lb/>
पूछ लीजियत पहिचाने सों । प्रीति न करियतु अनजाने<lb/>
सों ॥ शकुंतला सों तब यों कहि कै । बोले तब नृप सों<lb/>
रिसगहिकै ॥ सुनौ नृपति यह बात हमारी । भली बुरी यह<lb/>
नारि तिहारी ॥ छोड़हु याहि कि घर में राखहु । हमसों<lb/>
तुम अब कछु मति भाखहु ॥ ये बातें राजा सों कहि कै ।<lb/>
चले गौतमी को कर गहि कै ॥ तुम हूं छोड़ी या शठ<lb/>
छोड़ी । कहां जाउँ हौं जन्म निगोड़ी ॥ शकुन्तला यों<lb/>
रोय पुकारी । आपहु शिष्यन संग सिधारी ४३ ॥<lb/>
दोहा । शिष्यन के पीछे लगी शकुन्तला अकुलाय ॥<lb/>
पीछे देखि शकुन्तल हिं बोले शिष्य रिसाय ४४ ॥<lb/>
चौपाई । कहां अभागिनि तू इतआवत । सोई करति<lb/>
जो कछु मन भावत ॥ ज्यों नृप कहत जोतैं है तैसी ।<lb/>
करि है कहा सुता मुनि ऐसी ॥ सांचु जो है यह तेरो क-<lb/>
हिबो । उचित तोहिं यह पिय घर रहिबो ॥ मुनि के आ-<lb/>
श्रम तूं अब रहि है । सब जग तोहिं कलंकिनि कहिहै ॥<lb/>
पियकी जोह्वैरहिहै दासी । तेहूं न तेरी ह्वैहै हांसी ॥ योंकहि<lb/>
कै फिरि शिष्य सिधारे । राजायोंकहि फेरि पुकारे ॥ कहां<lb/>
जातहौ छोड़े जाको । झूंठी आशदेतहौ ताको ॥ ४५ ॥<lb/>
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दोहा । शकुन्तला की दुरदशा देखि दया मन ठानि ॥<lb/>
सोमराज प्रोहितबिबुध बोल्यो नृपसों आनि ४६ ॥<lb/>
चौपाई । लरिकाको यह ज्यावै जबलों । मेरे घरे रहै<lb/>
यह तबलों । ह्वै है सुत चक्कवै तिहारे । यह सब पंडित<lb/>
कहत पुकारे ॥ शकुन्तला जिहि पूतहि ज्यावै । सुजो च-<lb/>
क्कवै लक्षण पावै ॥ तो या को सांची करि मानो । महा<lb/>
राज अपने घर आनो ॥ और जो और तरह यह ह्वै<lb/>
है । तौ अपने मुनिके घर जै है ४७ ॥<lb/>
दोहा । सुर के मुनि के शापते नर बेसुध ह्वै जात ॥<lb/>
शापमिटे आवेसुरति फिरिपीछे पछितात ४८ ॥<lb/>
चौपाई । यह सुनि नृपति कही यह बानी । करहु<lb/>
जो तुम अपने मन आनी ४९ ॥<lb/>
दोहा । यह लैआयसु नृपति सों पीर राखि सब देह ॥<lb/>
शकुन्तलासों कहि उठो चलो हमारेगेह ५० ॥<lb/>
शिष्य छोंड़ या बिधि गयेया बिधिछोड़ी नाथ ॥<lb/>
शकुन्तला रोवतिचलीसोमराजकेसाथ ५१ ॥<lb/>
शकुन्तला को देखि दुख आगि लपटसी आय ॥<lb/>
माय मेनका लैगई शकुन्तलाहिउठाय ५२ ॥<lb/>
चौपाई । शकुन्तलाको सोधन पायो । प्रोहित दौरि नृप-<lb/>
ति ढिग आयो ॥ महाराज कह कहिये बैननि । ऐसो<lb/>
अचरज देखो नैननि ॥ अंशुवन की गहि नैननि माला ।<lb/>
चली साथ मेरे वह बाला ॥ धुनत दुहूंकर भाग अभा<lb/>
गी । जात हती मेरे संग लागी ॥ तब यक आगि लपट<lb/>
सी आई । चाहि गगन लै गइ उठाई ॥ यह सुनि हरष<lb/>
अंग उपजायो । राजा यह तब बचनसुनायो ॥ हम प-<lb/>
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हिलेही वह तजिदीन्हीं । भली भांति परमेश्वर कीन्हीं ॥<lb/>
यह कहि प्रोहित धरहि पठायो । नृप उठि शयन मंदिर<lb/>
हि आयो ॥ जऊ सुरति आवत कछु नाहीं । तऊभई<lb/>
चिंता चित माहीं ॥ नेकुन आवत नींद सुखन में ।<lb/>
रहति उदासी निशिदिनमन में ५३ ॥<lb/>
इतिश्री शकुंतलानाटककथातृतीयोंक: ३ ॥<lb/>
अथ चतुर्योंकः ॥<lb/>
चौपाई । शकुंतला जल में जो गिराई ।<lb/>
वही अंगूठी केवट पाई ५४ ॥<lb/>
दोहा । वही अंगूठी हाट ले बेचन गयो बजार ॥<lb/>
बेचत ही सो पकरि गोपायो अतिहीमार ५५ ॥<lb/>
चौपाई ।नृप को नाउँ अंगूठी देखो ।<lb/>
चोर केवटहि लोगन लेखो ५६ ॥<lb/>
दोहा । चोर जानि कै केवटहि पकर्यो तबकुतवाल ॥<lb/>
तहां अंगूठी को लग्यो केवट कहन हवाल ५७ ॥<lb/>
चौपाई । साहिब यह मैं नाहिं दुराई ।<lb/>
मैं यह तालहि भीतर पाई ५८ ॥<lb/>
दोहा । भरे ताल मछरीन के खेलत हतो शिकार ॥<lb/>
तहांअंगूठीललित यह कढ़िआयोपरिजार ५९ ॥<lb/>
चौपाई । यों सुनि केवट को छुटवायो । कोतवाल नृप<lb/>
के ढिगआयो ॥ आय अँगूठीनृपहिं दिखाई । शकुन्तला<lb/>
नृपको सुधि आई ॥ पैठोदुख जियसुख कढ़ि भाग्यो । टप<lb/>
टप दृग जल बरसन लाग्यो ॥ दोऊ करशिरमें दैमारे ।<lb/>
हायहायमुख बचन निकारे ॥ और कछून रहीसुधि तन<lb/>
में । नृप यों शोचन लाग्यो मन में ॥ कासों कहौं कहा मैं<lb/>
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कीन्हीं । मैं अपने गर छूरी दीन्हीं ॥ प्राण प्रिया घर<lb/>
बैठें आई । मोपै घर में रहन न पाई ॥ भूलि गई हवै<lb/>
सब दुख दाईं । अब वे बातें सब सुधि आईं ॥ प्रिया<lb/>
लाज तजि भेद बतायो । तऊ न मेरे मन कछु आयो ॥<lb/>
प्राण प्रिया इत ते मैं छोड़ी । चले शिष्य उत छोड़ि<lb/>
निगोड़ी ॥ करि पुकार मग रोवन लागी । तऊ दया<lb/>
नहिं मेरे जागी ॥ वह अब सब सुधि मन में करकति ।<lb/>
कहा करौं छतिया नहिं दरकति ६० ॥<lb/>
दोहा । दई अंगूठी आनि करि जादिन ते कुतवाल ॥<lb/>
तादिन ते लाग्यो रहन महा दुखित महिपाल ॥<lb/>
घनाक्षरी । देह पियरान लागी नेह की बिथा सो जा<lb/>
गी मूखर भागी नींद न परति एकौ छिन है । भावतुनराग<lb/>
बैराग सो हरत लीन्हे सुनि के दशायों सुख लागत अरि<lb/>
नहै ॥ आठौ पहरन कराहत ही बितावत शकुन्तलाकी<lb/>
सुधि हिये शालति कठिन है । केहूं दिन बीतत तो बीतत<lb/>
न राति अरु राति कहें बीतति तो बीतत न दिन है ॥<lb/>
चौपाई । राजा की यों देखि उदासी ।<lb/>
सिगरे दुखित नगरके बासी ॥<lb/>
घनाक्षरी । गाइबो बजाइवो सवनि बिसराय डास्यो<lb/>
छोहरनि खिलन को खेलिवो भुलाइगो । सब पुर बासी<lb/>
महा रहत उदासीन खोज हाँसी को सबनि के मुखन<lb/>
ते हिराय गो ॥ नारि औ पुरुष मिलि सबही बिसारो<lb/>
सुख सिगरे नगर में निरो दुख छाय गो ॥ सबही के सुख<lb/>
को दिवैया महिपाल सो शकुन्तला के शोच के समुद्र<lb/>
में सिरायगो ॥<lb/>
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घनाक्षरी । बिरही दुष्यंत महाराज जूके राजको<lb/>
अमल न कहूं निर्मल निहारियत है । कहत निवाज<lb/>
कहूं पावत न कुहुंकन कोकिल बागन तें उड़ाई मारि<lb/>
यत है ॥ बिकत न बजारमें न केसरी गुलाब और चौंर<lb/>
के रंगीले बसनन फारियत है । फूलन न पावत द्रुमन<lb/>
में बनाय फूल काचीकली गहि २ तोरिडारियत है ॥<lb/>
चौपाई । नित पियरात जात ज्यों रोगी । मनमारे<lb/>
नृप रहत वियोगी ॥ बारहिं बार गरो भरि आवत । लो-<lb/>
चन अँशुवन की झरिलावत ॥ राजकाज ते चित्तसके<lb/>
लो । बैठो रहत एकांत अकेलो । सूनोसो सिगरो जग<lb/>
लेखत । धरैध्यान भावहि तिहि देखत ॥<lb/>
दोहा । निहचल करि चितलाय मनमूंदि लिये युगनैन ।<lb/>
देखि ध्यानमें भावतिहि कहन लग्योनृप बैन ॥<lb/>
चौपाई । मन तें दूरिकरो निठुराई । परगट ह्वै अब<lb/>
देहु दिखाई ॥ कहा करों तब सुधि नहिं आई । जैसी<lb/>
करी सो तैसी पाई ॥ बिरह बिथा सों अब जिन मारो ।<lb/>
क्षमो एक अपराध हमारो ॥ ज्यों हम त्यों हम सो हुइ<lb/>
आई । तुम अपनी मति तजो बड़ाई ॥ छोड़हु कोप<lb/>
दया मन ल्यावहु । होहु जिते तित तें कढ़ि आवहु ॥<lb/>
इतनी कहत मूरछा आई । फैलि गई मुखमें पियराई ॥<lb/>
तनमें निकसि पसीना आयो । डोलत अब कछु हाथ न<lb/>
पायो ॥ दौरि चतुरिका दासी आई । मुख पर आनि ब-<lb/>
यारि डुलाई ॥ देखि चतुरिका रोवन लागी । तबकछु<lb/>
नृपहि मूरछा जागी ॥<lb/>
दोहा । देखि चतुरिकै सांसले उठोनृपति यों बोलि ।<lb/>
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जागिउठी मनिमूरछा दीन्हें दृगतबखोलि ॥<lb/>
चौपाई । ते बिनु काजहिको इत आई । महा मूरछा<lb/>
आनि जगाई ॥ घरिक मूरछामें कलपाई । फिरिमोकोतैं<lb/>
सुरति दिवाई ॥ दुखकी खानि नृपति यों खोली । चतुर<lb/>
चतुरिका दासी बोली ॥<lb/>
दोहा । महाराज अचरजबड़ो सर्ब गुणनिकी खानि ।<lb/>
शकंतला किहिंहरिलई यहकछुपरीनजानि ॥<lb/>
चौपाई । राजातबवहबातसुनाई । हतीमेनकाकीवहजाई ॥<lb/>
दोहा । सहिन सुताकोदुख सकीउतरि गगनतें आय ।<lb/>
माय मेनका लेगई भुवते वाहि उठाय ॥<lb/>
चौपाई । राजा कही सांच तब बानी । चतुर चतु-<lb/>
रिकाफिरि बतरानी ॥<lb/>
दोहा । शकुंतलहि जो लेगई पकरि मेनका आप ।<lb/>
महाराज तौ हरबरैं हुईहै बहुरि मिलाप ॥<lb/>
चौपाई । तबलों अपनो गिनत न कछु सुख । माय<lb/>
सुताको देखति जब दुख ॥ तुम्हें सुरति आई करिपैहै ।<lb/>
फेरि मेनकाताहि मिलैहै ॥ राजा फिरि यहबचन निकारो ।<lb/>
ऐसो है नहिं भाग हमारी ॥<lb/>
दोहा । हम भुवमंडल इत रहत रही जाय सुरलोक ।<lb/>
क्यों मिलापह्वै सकत अब मिटत हमारा शोक ॥<lb/>
चौपाई । यों कहि नृप मन गही उदासी । बोली फेरि<lb/>
चतुरिका दासी ॥ महाराज मैं कहत न झूठी । यहकै-<lb/>
से मिलि गई अंगूठी ॥ कहां गिरी जल में किहिं पाई ।<lb/>
महाराज के कर फिर आई ॥ चतुर चतुरिका यों सम-<lb/>
झायो । भेद अंगूठी को सुनि पायो ॥ महाराज अति<lb/>
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दुख सों पाग्यो । कहन अँगठी सों यों लाग्यो ॥ जग<lb/>
में बड़ी अभाग्यो मैंरी । तुहूं बड़ी अभागिन हैरी ॥<lb/>
तोहिं हतीतो पहिरें प्यारी । तासों छोड़ भई तूं न्यारी ॥<lb/>
अब पीछे तू हूं पछितैहै । वैसी कहां अंगूठी पैहै ॥<lb/>
दोहा । सुधि बुधि कछुतनमें नहीं मनको कठिनहवाल ।<lb/>
रहत बावरो सो बकत ब्याकुल यों महिपाल ॥<lb/>
शकुन्तला को मेनका जब ले गई उठाय ।<lb/>
तब कश्यप मुनिनाथ के आश्रम राखी जाय ॥<lb/>
कश्यपके आश्रम रहत बीति गयो कछु काल ।<lb/>
शकुन्तला के सुत भयो भस्यो भाग्य सों भाल ॥<lb/>
चौपाई । भरत नाम सुतको ठहरानो । कछु दिन में<lb/>
कछु भयो सयानो ॥ गंडा बांधि गरे मुनि दीन्हो । तिहि<lb/>
गंडा को फलअस कीन्हो ॥<lb/>
दोहा । माई बाप को छोड़ि कै और छुवै जोवाहि ।<lb/>
काटे कालीनाग ह्वै यह गंडा तब ताहि ॥<lb/>
तब कछु दिन में मेनका कहो इन्द्र सों जाइ ।<lb/>
तुम राजा दुःष्यन्त को भेजहु यहां बुलाय ॥<lb/>
यहां बुलाइ बनाइ के राजहि सुरति दिवाय ।<lb/>
शकुन्तलहि गहि बांह तब दीजै फेरि मिलाय ॥<lb/>
नृपहिं बुलावन हेततब करो बहुत सन्मान ।<lb/>
भेजो मातलि सारथी सुरपति सहित बिमान ।<lb/>
चौपाई । राजा बिरह बिथा सों छायो । इन्द्र सारथी<lb/>
मातलि आयो ॥ ललित बिमान इन्द्र को लायो । मा-<lb/>
तलि ड्योढ़ीपर तब आयो ॥<lb/>
दोहा । चोबदार नृपसों कह्यो महाराज मघवान ।<lb/>
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भेज्यो मातलि सारथी लायोललित बिमान ३५ ॥<lb/>
चौपाई । सुनतहि राजा तुरत बुलायो । मातलि म-<lb/>
हाराज ढिग आयो ३६ ॥<lb/>
दोहा । मातलि कस्यो सलामतब पूंछनलग्यो नरेश ।<lb/>
कहो कुशल सों रहत हैं सबके सुखद सुरेश ३७ ॥<lb/>
चौपाई । कुशल क्षेम मातलि कहि दीन्ही । राजा<lb/>
सों फिरि बिनती कीन्ही ॥ महाराज ढिग मोहिं पठायो ।<lb/>
यह सँदेश सुरनाथ सिखायो ॥ हमसों दानव करत<lb/>
लराई । होहु हमारे आनि सहाई ॥ आनि दानवन को<lb/>
इत मारो । बड़ो भरोसो हमैं तिहारो ॥ मातलि जबहिं<lb/>
सँदेश सुनायो । सुनि महिपाल महा सुखपायो ३८ ॥<lb/>
दोहा । अंबर आछे पहरिके कमरबांधि हथियार ॥<lb/>
राजा अम्बर को चल्यो ह्वै बिमान असवार ३९ ॥<lb/>
चौपाई । राजा चढ़ि बिमान में आयो । मातलि ग-<lb/>
गन विमान चलायो ॥ नृप ह्वै मगन गगन नगिचायो ।<lb/>
तब इक अचल नजरिमें आयो ४० ॥<lb/>
दोहा । परसु भुवार अकाश में लीन्हो ललितबहार ॥<lb/>
राजा यों पूछनलग्यो है यहकौन पहार ४१ ॥<lb/>
मातलि तब कहि यों उठो हेमकुंठठ है नाम ॥<lb/>
महाराज यह अचलमेंकश्यपमुनिकोधाम ४२ ॥<lb/>
चौपाई । कश्यपमुनि कहँ नृप सुनिपायो । मातलि<lb/>
को यहबचन सुनायो ॥ रथयह गिरिकै सन्मुख कीजै ।<lb/>
मुनिवरको दरशन करिलीजै ॥ मातलि अचल निकट<lb/>
रथ लायो । राजा उतरि अचल में आयो ४३ ॥<lb/>
दोहा । शकुंतलाको सुत तहां देखो जाय नरेश ॥<lb/>
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बलसोंसिंधिनिकेसुतहिं खैंचतधरि२केश ४४ ॥<lb/>
सँग लागीं ह्वै तपसिनी तिनकी सुनि तबबात ॥<lb/>
शकुंतलाकोसुत गिनत सिंघिनसुतकेदांत ४५ ॥<lb/>
चौपाई । याबिधि बालको लखिपायो । नृपके मन<lb/>
अद्भुत रसछायो ॥ बालकके सँग चितअनुरागो । मनमन<lb/>
नृपति कहनयों लागो ॥ ज्यों अपने सुतकीउरलागति ।<lb/>
याकी मोहिं मयात्यों लागति ॥ बिन सुतको बिधि मोहिं<lb/>
बनायो । मयालगति लखि पूत परायो ॥ बालहिं बैस<lb/>
बीरता बाँको । यहअद्भुतसुत है धौं काको ॥ मनमें उप-<lb/>
ज्योअद्भुतरसअति । पूछनलग्यो तापसिननरपति ४६ ॥<lb/>
दोहा । बोलिउठीं तब तापसी कहा कहें हम हेत ॥<lb/>
याके पापीबापको नाउँ न कोऊलेत ४७ ॥<lb/>
सुलज सुशील पतिब्रता शकुंतलासीनारि ॥<lb/>
जिहिं बिनकारणतजिदई घरतेदीन्हनिकारि ४८<lb/>
ये बातें सुनि के भयो नृप के मन संदेह ॥<lb/>
फेरिभेदपूछनलगो राजाकरिअतिनेह ४९ ॥<lb/>
चौपाई । याको पिता पापयुत जो है । याकी माय<lb/>
कहो तुम को है ॥ राजा इहि बिधि बातें खोलीं । फेरि<lb/>
तापसी दोऊ बोलीं ५० ॥<lb/>
दोहा । महाबीर यह बालकी शकुंतला है माय ॥<lb/>
ताहि मेनका ता समय ल्याई इहांउठाय ५१ ॥<lb/>
यह सुनिकर आनन्द तब मनसंदेह मिटाय ॥<lb/>
हालआयमहिपालतब लीन्होंसुतहिउठाय ५२ ॥<lb/>
हरबर भरिआयोगरो दृग आंशु बरसाय ॥<lb/>
कहनतापसिनसोंलगो राजायोंसमुझाय ५३ ॥<lb/>
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चौपाई । जाको तुम मुख नाउँ न काढ़ो । वह पापी<lb/>
मैंहीहौं ठाढ़ो ॥ पतिव्रतावह प्राणपियारी । मैंपापी बिन<lb/>
हेत निकारी ॥ प्राणपियारी मोहिंदिखावो । मेरो अइबो<lb/>
जाय सुनावो ॥ बालक गरे जो गण्डा राजै । सोहै सां-<lb/>
पन काटतु राजै ॥ यह तापसिन भेद मन आन्यो ।<lb/>
सांचो करि दुःष्यन्तहि जान्यो ५४ ॥<lb/>
दोहा । दौरिगई तब तापसिन यहसबभेद बताय ॥<lb/>
शकुंतलहिको आपनै ल्याई जाय लिवाय ५५ ॥<lb/>
मुख मैले मैले बसन फैले मैले केश ॥<lb/>
आई पियके पास तब शकुंतला यहभेश ५६ ॥<lb/>
देखतभरिआयो गरो दृगनरहो जलछाय ॥<lb/>
पिय ढिग ठाढ़ी ह्वैरही शकुंतला शिरनाय ५७ ॥<lb/>
चौपाई । राजहि और न कछु कहिआयो । शकुन्तला<lb/>
के पग शिरनायो ५८ ॥<lb/>
दोहा । पाप लगावत क्यों हमें परसि हमारे पांय ॥<lb/>
योंकहि सुसकिशकुंतला राजहिलियोउठाय ५९ ॥<lb/>
चौपाई । शकुन्तला फिरि बात चलाई । क्यों तब<lb/>
मेरी सुधि बिसराई ॥ महाराज अब क्यों सुधि आर्ह ।<lb/>
राजा तब यह बात सुनाई ॥ यह मैं जबै अंगूठी पाई ।<lb/>
याहि लखतही सबसुधि आई ६० ॥<lb/>
दोहा । जा दिनते आई सुरति तादिनते यह हाल ॥<lb/>
निशि दिनकहतैहीरह्यो जियनभयोजंजाल ६१<lb/>
चौपाई । अब कछु गिनोन दोष हमारो । कठिन पी-<lb/>
छिलो दुःख बिसारो ६२ ॥<lb/>
दोहा । यहसुनि बचन शकुन्तला बोलीकरि अनुराग ॥<lb/>
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महाराजको दोष कह बुरो हमारो भाग ६३ ॥<lb/>
चौपाई । नखशिख नृपति सुखनि सों छायो । सुनि<lb/>
मुनि कश्यप नृपहिं बुलायो ६४ ॥<lb/>
दोहा । तनमें नहीं समात यों मन में बंड़ो हुलास ॥<lb/>
शकुन्तलाअरुसुतसहितआयोनृप मुनिपास ६५ ॥<lb/>
चौपाई । राजा लखि प्रणाम तब कीन्हों । आशि-<lb/>
बार्द महामुनि दीन्हों ॥ अपनेढिग मुनि नृपहिं बुलायो ।<lb/>
कुशलपूछि सादर बैठायो ६६ ॥<lb/>
दोहा । शकुंतलाकीओर लखिअरुलखिसुत अवदात ॥<lb/>
इहिविधितब महिपालसों कहीमहामुनिबात ६७ ॥<lb/>
शकुंतला है कुलबधू यह सुत है शुभयोग ॥<lb/>
राजबंशके रतन तुम भलो बनो संयोग ६८ ॥<lb/>
चौपाई । मुनिवर यह शुभ बात सुनाई । राजा यह<lb/>
फिरि बात चलाई ॥ मुनिवर कहौ दया मन ल्यावहु ।<lb/>
मेरेमनको भ्रम सोमिटावहु ॥ तुमत्रिकालकी जानतबातें<lb/>
मैं तुमसे यह पूछत तातें ६९ ॥<lb/>
दोहा । कियो गंधरब ब्याह मैं याकेसंग करि प्रीति ॥<lb/>
फिरि मोको सुधिना रहीअद्भुतहैयहरीति ७० ॥<lb/>
चौपाई । पीछे यह घर बैठे आई । मोसों घरमें रहन<lb/>
न पाई ॥ पहिले मैं क्योंसुधि बिसराई । लखत अंगूठी<lb/>
क्यों सुधि आई ॥ भयो अचंभो योंचित माहीं । मोको<lb/>
जानि परत कछु नाहीं ॥ राजा यहिबिधि बचनसुनायो ।<lb/>
मुनिबर हंसि राजहिं समुझायो ७१ ॥<lb/>
दोहा । शकुन्तलाको मेनका ल्याई जबै उठाय ॥<lb/>
तबहींयह धरि ध्यानमें जान्योंभेद बनाय ७२ ॥<lb/>
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दीन्हों शाप शकुंतलहि दुर्बासा करि रोष ॥<lb/>
ताते तुम बेसुध भये तुम्हें कछू नहिं दोष ७३ ॥<lb/>
चौपाई । सोई शाप सखियन सुनि पायो । शकुंतला<lb/>
को नहीं सुनायो ॥ सखियन वहमुनि जाय मनायो । तब<lb/>
मुनि कछुक दया उरलायो ॥ मुनि यहकह्यो नृपहिंसुधि<lb/>
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सब सुधि बिसराई । लखन अंगूठी सब सुधि आई ॥<lb/>
याको दुख कछु मन नहिं आनौ । मेरो कहो उचित<lb/>
करि जानौ ॥ इँद्र तुम्हें यहि हेत बुलायो । शकुंतला<lb/>
सों चहत मिलायो ७४ ॥<lb/>
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करो जाय घरयज्ञ अब महाराज तुम राज ७५ ॥<lb/>
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हेतु बुलावा ॥ काजौ तुमसे भयो हमारो । तुम अवअ-<lb/>
पने घरहि सिधारो ७६ ॥<lb/>
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शकुंतलासुत सहितनृप आयो अनेधाम ७७ ॥<lb/>
चौपाई । इहिबिधि भाग्य भाल में जाग्यो । राजा<lb/>
राज करन फिर लाग्यो ॥ नृपके सुख सब रैयति राजी ।<lb/>
घर २ पुर में नौबति बाजी ॥ शकुंतला तब भइ पट<lb/>
रानी । यह इतनी ह्वैचुकी कहानी ७८ ॥<lb/>
इतिश्रीशकुन्तलानाटककथाचतुर्योङ्कसम्पूर्णम् ॥<lb/>
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मात्रा अक्षरदोहरा बुध बिचार करि लेव ॥<lb/>
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इस मतबे में जितने प्रकारकी काब्यकी पुस्तकें छपी<lb/>
हैं उनमें से कुछ नीचे लिखीजाती हैं ॥<lb/>
नवीनसंग्रह ॥<lb/>
जिसमें भक्तभयहारी कुञ्जविहारी रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण<lb/>
चन्द्र और श्रीराधिकाजीके लीलाविषयक नानाप्रकारके अत्यु-<lb/>
त्तम कबित और सवैयादि वर्णितहैं जिसको हफ़ीजुल्लाहखांसां-<lb/>
ड़ीनिवासि सुदर्रिस मदर्सा मौज़ा बन्नापुर परगनै बंगर थाना<lb/>
बघौली स्टेशन ज़िला हरदोई ने अपने शौक़ीन दोस्तोंके दि-<lb/>
लबहलानेके निमित्त अति परिश्रमसे संग्रह किया ॥<lb/>
षट्ऋतुकाव्यसंग्रह ॥<lb/>
हफ़ीतुल्लाहख़ां संग्रहीत जिसमें वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद<lb/>
हेमन्त, शिशिर, छओ ऋतुओंके कबित्त व सवैया ऐससे२ अत्यु-<lb/>
रंगीन तबीयतवाले महाशयोंके चित्तविनोदार्थ बड़े परिश्रमसे<lb/>
छांट २ कर लिखेगये हैं ॥<lb/>
प्रेमतरङ्गिनी ॥<lb/>
मुंशीहफ़ीजुल्लाहख़ां संग्रहीत इसमें चित्रविचित्र सामयिक<lb/>
देवपक्ष व प्रत्येक ऋतुओं के कबित्त सवैया हरएक कविके बनाये<lb/>
हुये संग्रह किये गये हैं इसकी उत्तमता देखनेहीसे मालूम<lb/>
होती है ॥<lb/>
हफ़ीजुल्लाहखांका हजारा ॥<lb/>
इसमें नानाप्रकार के बहुतही उत्तम २ सब १९८४ कबित्त<lb/>
लिखे गये हैं स्थान २ पर तसवीरैं भी बनी हैं ऐसा ग्रंथ कबित्तों<lb/>
का संग्रह कियाहुआ आजतक देखनेमेंनहीं आया उत्तमता दे-<lb/>
खनेसे प्रकटहोगी रसिकपुरुषोंके लिये अत्यन्त आनन्दकारी है<lb/>
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कृष्णप्रिया ॥<lb/>
मंगलीप्रसाद विरचित ब्रजविलासकी तरहपर श्री कृष्णजी<lb/>
का जन्म से बैकुण्ठगमन पर्यन्त चरित्र है यहकाब्यालंकारयुक्त<lb/>
बहुतही सुन्दर पुस्तक है ॥<lb/>
मनमोहनी ॥<lb/>
हुफ़ीजुल्लाहख़ां संग्रहीत इसमें अच्छी २ दोहा मिली हुई<lb/>
ग़ज़लें और बहुत उत्तम २ भजन, होली, ठुमरी, चौमासा, वि-<lb/>
हाग भैरवी, दादरा, कबित्त और सवैया आदि विद्यमान हैं ॥<lb/>
रामसुधा ॥<lb/>
जिसको ब्रजचन्दजी ने महाराजाधिराज काशीनरेश की<lb/>
आज्ञानुसार अनेक रागों व कबित्तों में श्रीरामचन्द्रजीका गुणा-<lb/>
नुवाद गाया है ॥<lb/>
कविप्रिया सटीक ॥<lb/>
टीका हरिचरण दास कबि कृत-जिसमें नृपबंश व कविबंश<lb/>
वर्णन, कवित्तदूषण, कवि व्यवस्था, गणागणफलाभाव, सामान्या-<lb/>
लंकार, नखशिख, नायक नायका भेद और चित्रालंकारादि<lb/>
वर्णित हैं ॥<lb/>
शृ्ंगारसंग्रह ॥<lb/>
सरदार कवि संग्रहीत इसमें भाषा के उत्तम २ कवियों के<lb/>
नायकाभेद व अलंकार के कवित्तहैं और बहुतसे कवियों की<lb/>
गुणना भी लिखित हैं ॥<lb/>
श्यामकेलि ॥<lb/>
लाला गोविंद सहाय कायस्थ भटनागर सिकंदराबादी कृत,<lb/>
इस में श्रीकृष्ण व राधा जी के चरित्र और लीलाओं का<lb/>
वर्णन है ॥<lb/>
कुंडलिया गिरिधरदासमूल ॥<lb/>
इसमेंगिरिधरदास जीने सामयिक वार्त्ता, चेतावनी कुण्डलि-<lb/>
योंमें वर्णन की हैं ॥<lb/>
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कृष्णसागर ॥<lb/>
राधाकृष्णजी रचित जिसमें श्रीकृष्णजीका नवीन रीति से<lb/>
परिपूर्ण चरित्र वर्णितहै ॥<lb/>
बिश्रामसागर बहुत मोटे अक्षर बातसवीर ॥<lb/>
जिसको महन्त श्रीरघुनाथदास रामसनेहीने प्रेमियोंके लिये<lb/>
बनाया जिसमें छहों शास्त्र और अठारहों पुराणों के मत और<lb/>
नवीन रीति से श्रीकृष्णचन्द्र व रामजी के सरल चरित्र पद्य में<lb/>
रचेहुये हैं ॥<lb/>
रघुवंश भाषा टीका सहित ॥<lb/>
जिसके मूल श्लोकों को कालिदास कबि और भाषाटीका<lb/>
को राजा लक्ष्मण सिंह साहब बहादुर डिप्टीकलक्टर बुलन्द<lb/>
शहरने किया यह ऐसे कवि हैं कि इनकी कीर्ति हिन्दुस्तान से<lb/>
बिलायत तक है जिसमें राजा दिलीप का सन्तान न होने से<lb/>
रानी समेत वशिष्ठजी के आश्रमपर जाकर सुरभी की पूजा का<lb/>
उपदेशपा रानी समेत नन्दिनी गौकी सेवाकर राजाका२१दिन<lb/>
गौको बनमें चराना और गौको मायासे उपजेहुये सिंहसे बचा<lb/>
कर दूध और पुत्रहोने का वरदान पाना फिर दिलीपसे रघुका<lb/>
पाना दिलीपका निन्नानबे अश्वमेध यज्ञ करना और सौवें यज्ञ<lb/>
में इन्द्रका घोड़ा हरलेजाने में रघु और इन्द्र से घोरयुद्ध होकर<lb/>
इन्द्रका सौवें यज्ञ के फल पानेका वरदान पाना फिर रघुसे अज<lb/>
अज से दशरथ दशरथसे रामचन्द्रादि चारों भाइयों की सम्पूर्ण<lb/>
कथा इत्यादि अनेक चरित्र १९ सर्गोंमें बर्णितहैं ॥<lb/>
प्रेमसागरबातसवीर ॥<lb/>
लल्लूजीलाल कबिकृत इसमें दशमस्कन्ध भागवतकी पूरी<lb/>
कथा ब्रजभाषामें वर्णितहै ॥<lb/>
माधवबिलास॥<lb/>
माधवप्रसाद तेवारीजी संग्रहीत इसमें नायकाभेद के कबित्त<lb/>
वर्णितहैं ॥<lb/>
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